Saturday, 16 January 2016

अ-भूमिगत विद्रोह

विद्रोह है कि भूमिगत होता ही नहीं है
और घर है कि जला जाता है
मैं जितनी देर में तय करता हूँ गैस और माचिस के बीच 

अपने भीतर खौलते आग की प्राथिमकताएँ
उतनी देर में झुलस जाता है मालदा
ह्रदय में ज्वालामुखी-सा सुलगता है पठानकोट
किसी एक नस में टीस मारता है उत्तर प्रदेश
मैं दिल में घाव लिए बम धमाकों की ज़मीन पर जलता हूँ

मेरे ह्रदय में गहरे तक चाक है जाने कितनी ही 26/11 के अटैक


मैं एक मध्यम-वर्गीय आदमी हूँ
मेरे भीतर काबिज़ है मध्यम-वर्गीय विद्रोह की प्रवृत्तियाँ
और यही मध्यम-वर्गीय प्रवृति तय नहीं कर पाती
कि रोटी-रिश्तों और देश में सबसे जरूरी चीज़ क्या है 


मैं रोज़ लड़ता हूँ अपने भीतर भीतरघात करती
इस मध्यम-वर्गीय जुर्रत और भगोड़ेपन से
कभी कभी सूझता ही नहीं की
माँ के आँचल के कोने और
पिता की बल खा चुकी पीठ पर लदे दुखों के बीच 


मैं अपने ह्रदय में आहत "भारत" नाम के घाव का स्थानान्तरण कर
कहीं अपनी ज़िम्मेदारियों की उपेक्षा तो नहीं कर रहा है


और ऐसे कर्म-संकट में मैं किंकर्तव्यविमूढ़ इस अन्तर्द्वन्द से जूझता हूँ
कि वैश्विक जिम्मेदारियाँ निभाना भी तो एक किस्म की पारिवारिकता है !
ऐसे भयंकर लावाई ऊहापोह के बीच
मैं अपने रक्त में नामजद रखता हूँ अपने पीड़क असन्तोष 


मैं कविता में असन्तोष लिखकर मशाल चलाता हूँ
मेरी कविताएँ मेरे उसी अ-भूमिगत विद्रोह की एफ़० आई० आर० हैं !

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