गाँव से शहर तक (From the village to city.)
गाँव
से
शहर
तक
:01 ( परिवेश
)
दोस्त अपना घर बनवा रहा था और उसे कमरे की फ्लोर पर टाइल्स या मार्बल लगवाना था, उसके साथ साथ मै भी शहर के एक बड़े टाइल्स के शोरुम में गया , जब दुकानदार दोस्त को देशी , विदेशी , इटालियन और न जाने क्या क्या दिखा दिखा रहा था तब मेरा मन उड़ कर अपने गाँव की उस दलान में पहुंच गया जिसे गोबर से लीप दिया जाता था , और हमारी गर्मियों की दोपहर हमे उस गोबर , पानी और मिटटी कि मिली जुली खुशबू के बीच नीद के आगोश में कब ले लेती थी पता ही नही चलता था , मुझे न जाने कब से उस दोपहर का इंतिजार है .
हर घर के बहार होता था तिन से बना छप्पर . बारिश में टपकती बूंदों के बीच स्टील के बड़े से ग्लास में चाय पीना जो अहसास दिलाता था वो आज CCD के आधुनिकता से सजे काफी के मग शायद ही दिला सके.
मेरे बड़े से दरवाजे के किनारे पर न जाने कब से स्थापित था एक देवी मंदिर . पुरे गाँव में किसी के घर जब भी कोई मांगलिक काम होता था तो सबसे पहले पूजा यही होती थी , और हर मांगलिक कार्यकम “ रामखेलावन एंड बैंड कंपनी “ के बिना अधूरा था . “ रामखेलावन एंड बैंड कंपनी “ में कुल पांच लोग होते थे . इनके पास होती थी एक साईकिल जिसके कैरियर में बंधी होती 6 वाट की बैटरी , हैडल में बंधा होता था एक बड़ा सा भोंपू और उस भोपू और बैटरी से जुडा रहता था रामखेलावन के हाथ में थमा “ बैंजो “ . और जब उस बैंजो से “ परदेशी परदेशी जाना नही “ की धून निकलती थी तो संजय की अम्मा से लेकर सुनील मम्मी न जाने कितनी देर तक नागिन वाला नाच नाचती रहती थी , न कभी धून बदली न नाचने वालो की लय .
मई की दोपहर में एक महिंद्रा जीप ( बाद में जिसका स्थान बूलेरो ने ले लिया था ) आ कर रूकती है , जीप की आगे की सीट पर गहरे रंग का ढीला सा सूट पहने ( जो उनके शहर वाले चाचा के लड़के का है ) विजयपाल यादव . और पीछे की सीट पर गहरे लाल रंग की सितारों वाली भारी साड़ी में लम्बे घूंघट में दुबकी सी बैठी है विजयपाल की नवविवाहिता पत्नी . विजय की शादी पडोसी जिले के किसी गाँव में हुयी है और उन्हें घर जाने से पहले मंदिर की पूजा करनी है , गाँव भर के बच्चो ने जीप को घेर लिया है और उसे हसरत से छू कर देख रहे है . महिलाओं और लडकियाँ मंदिर को तीनो और से घेर कर खड़ी है ताकि पूजा के समय दुल्हन के हाथ देख कर उसके रंग रूप का अंदाजा लगा सके . और आज देर रात तक शादी वाले घर में ढोलक पर इन्ही महिलओं के गीत गूंजेगे .
मुझे
अभी
भी
बड़े
बड़े
शहरों
के
जगमगाते माल्स
में
जाने
पर
न
जाने
क्यों
याद
आ
जाती
है
हमारे
आसपास
के
तीन
चार
गाँवो
को
मिला
कर
सप्ताह में
दो
बार
शाम
को
लगने
वाली
बाजार
या
हाट
. जिसमे
होती
थी
अधिकतम दस
से
बारह
दुकाने . सब्जी
लेनी
हो
या
तेल
नमक
, महकुआ
साबुन
हो
या
ताजा
कटे
बकरे
का
गोश्त
इन
बाजारों में
सब
मिलता
था
, एक
कोने
में
महम्मूद कुंजरा तम्बाखू प्रमियो की
जरुरतो को
पूरा
करने
के
लिए
अपनी
दुकान
सजाता
तो
दूसरी
तरफ
बबलू
गुप्ता के
1 रुपय
के
तीन
गोलगप्पे और
2 रुपय
की
टिक्की बच्चो
और
महिलाओ के
मुंह
में
पानी
ले
आता
.
क्या
कहा
बाजार
करने
के
लिए
पैसे
नही
है
?? अरे
तो
एक
झोला
उठाइए
उसमे
गेंहू
, धान
या
जो
भी
अनाज
घर
पर
हो
डालिए
और
पहुच
जाइये
बाजार
में
सबसे
पहले
बोरा
बिछा
कर
बैठे
चिंता
बनिया
की
दुकान
पर
अनाज
दीजिये, पैसे
लीजिये और
बाजार
कीजिये और
उसी
झोले
में
समान
भर
कर
ले
आइये
.... अनाज
गाँव
का
क्रेडिड कार्ड
होता
हैं
.....
2
( जायका )
कल ऑफिस से वापस जाते समय भतीजे की जिद पर
उसके लिए “ अमूल कूल “ की बोतल ले गया और मन ही मन सोचता रहा की क्या इस आने वाली पीढ़ी
तक पहुच पायेगा वो हल्का मीठा सोंधा सा स्वाद जो आता था दूध के घंटो तक मिटटी की हांड़ी
( दूहांड़ी ) में रख कर उपलों की मंद आंच पर पकाने पर और उसके ऊपर पड़ने वाली हल्की
गुलाबी मलाई .......
कल मेरे साथी बता रहे थे की अब वो सिर्फ “
सफोला गोल्ड “ तेल का ही खाने में इस्तेमाल करते है क्युकी ये सबसे मंहगा है तो शुद्ध
भी होगा , बरबस ही मुझे याद आई गाँव से बहार लगी चक्की और उस से निकलने वाली
आवाज का दूर तक जाना ... और याद आया चक्की की आवाज सुनते ही एक छोटे से लड़के का अपने
पापा की 24 इंची साईकिल पर बीच 15 किलो की सरसों की बोरी रखना और हैडल पर रथ वनस्पति
का 5 किलो का डब्बा लटका का उस उस चक्की पर पहुंच जाना . और वापस आते समय
तेल से भरे हुए डिब्बे के साथ होती थी खली की झार से निकलने वाले आंसू . आज
उन आंसुओं को याद करके आंसू आ गए . क्या “ सफोला गोल्ड “ हमारे उस रथ वाले डिब्बे
में भरे तेल से ज्यादा शुद्ध होगा ..?
पिछले महीने एक ट्रेडफेयर में शिरकत करने के
लिए एक बड़े शहर में था , बड़ी बड़ी चमचमाती गाडियों के बीच में मै उड़ कर पहुच
गया सुबह सबेरे बैलगाड़ी में ( बाद में जिसकी जगह टैक्टर की ट्राली ने ली थी
) बैठ कर कर्तिक पूणिमा की गंगा नहाने . हम बच्चो को गंगा नहाने की जगह गंगा किनारे
के बाग में लगा मेला मुख्य आर्कषण होता था ...
3
( यादे )
होली में कानफोडू बजते अश्लील गानों
पर नाचते देशी विदेशी शराब में डूबे मोहल्ले के कुछ लड़के और घरो में दुबके
‘ I hate holi “ , “ मुझे color से एलर्जी है “ , use only Natural color “
save watar “ का नारा लगा कर whtsapp और facebook पर बनावटी होली खेलते
white collar शहरी भद्रजनों से इतर गाँव की किसी चौपाल पर सज चुकी होती थी फांग (डीयो
नही गाँव में होली पर गाय जाने वाले लोकगीत ) की महफिल . पूरे गाँव के
एक स्वर से निकलती कृष्ण और राधा की प्रेम लीला , बड़ी और छोटी ढोलके , झींका , नगाड़े
के साथ रंगों की बौछार . हर दरवाजे में फगुवारो के स्वागत में बांस की स्वयम से
बनाई गयी पिचकारियो से रंग डालते बच्चे , भाभी और चाची के हाँथ की बनी गुझिया , भांग
मिली ठंडाई और पान . शाम तक फांग गाते गाते गले फट जाते थे , ढोलक बजाते बजाते हाथ
उठने से मना कर देते थे . पर क्या मजाल की होली का जज्बा या रंग जरा भी फीके हो . गाँव
के त्योहारों में आज भी अपनापन है और शहर के त्योहारों में दिखावे की सिवाय कुछ भी
नही .
नागपंचमी के समय लगने वाले अखाड़े न जाने कंहा
खो गए ? दिवाली में “ धरती माता जागो जागो “ की आवाज शहर आ कर सो गयी
. हनी सिंह गानों के दौर में अगर कोई आल्हा गाने, सुनने या समझने वाला मिल जाता है
तो लगता है भीड़ में कोई अपना मिल गया . मुझे आज भी याद आता जब हर त्यौहार में
शाम को घर नेग लेने आते थे गाँव के धोबिन चाची , कहारिन भौजी , डोमिन दादी , नवा भैया
, तंबोलिन भाभी और जिनके लिए नेग उनका हक था , माँ कई दिन पहले से तैयार करने
लगती थी इन सब को देने के लिए न जाने क्या क्या ?
और इन सब के साथ साथ करवट ले रहा था हमारा
बचपन , आज की पीढ़ी की तरह हमारे पास न वीडियो गेम थे और न माल में सजे बड़े बड़े
fun zone . तलाब के पानी में एक ईट के टुकड़े को तीन बार टिप्पा खिला देना हमारे
लिए किसी gun shooting games से कम न था . पापा की 24 इंची एटलस साईकिल को चबूतरे के
सहारे टिका कर कैची चलाना किसी कार को चलाने का एहसास दिलाता था . खराब
हो गए साईकिल के टायर को डंडे से मार् कर उसके साथ भागना , गुल्ली डंडा , कंचे
, गेंदतड़ी हम गाँव के बच्चो के लिए नेशनल खेल थे , तो बित्ती, आइस पाइस , खो खो और
गोट्टा पर लडकियों का एकाधिकार था . और इन सब के बीच में राजा मंत्री , चिड़ियाउड़
और उक्को बोक्को पर बालक बालिकाए सामान अधिकार रखती थी .
कभी कभी जब लैंप की रौशनी में, पक्की दीवार
पर बनती परछाई से एक दुसरे को डराते डराते मैं सच में डरने लगता था, मुझे पसदं
था आग लगी लकड़ी को गोल गोल जोर से घुमाना, और उस से बनती गोल गोल लाल लाल कलाकारी
से विस्मित होना, नानी अक्सर डांट दिया करती थी ये सब करते वक़्त, ये भी कहते हैं जो
बच्चे आग से खेलते हैं वो रात में बिस्तर पर सू सू भी करते हैं, मुझे पता था की तर्कहीन
बात थी, लेकिन मैं रिस्क भी नहीं लेना चाहता था, झू जू के पैयां के खेलना लगभग रोज
रात को सोने से पहले का शौक था, और कभी स्पेशल रिक्वेस्ट पे बड़ा भाई हवाई जहाज भी
बना देता था, बाकी बच्चों से अलग में दूध बहुत चाव से पीता था, और कॉम्प्लान वाले बच्चों
को देख कर मुझे अचरज होता था, रात को सरसो के तेल वाले दिए से पीतल के बेले पे नानी
काजल तैयार करती थी, मैं बिलख के नाना से कहानी सुनने के वादे पे काजल लगवा लेता था,
कभी कभी सुबह को आँखे चिपकी हुई मिलती थी, जिन्हे नानी चाय की पत्ती के गुनगुने पानी
से खुलवाती थी, और उसी दौर में हमारी स्वेत श्याम दुनियां में हर रविवार दोपहर 12 बजे
आता था हमारी जिंदगी का पहला सुपर हीरो “ शक्तिमान ’” सालो तक गंगधार ही
शक्तिमान ये बात हमारा बाल मन मानने को तैयार नही था .
हमारे गाँव और पड़ोस के गाँव की सीमा पर था
हमारी जिंदगी का पहला प्राथमिक स्कूल . जंहा जाने के लिए हमारे पास लक्जरी बसे नही
थी थी तो मिटटी की पतली पगडंडिया . स्मार्ट AC क्लास रूम , नोट पैड की
जगह हमने लकड़ी की पाटी में बरगद के पेड़ नीचे गुरु जी ने खड़िया से लिखना सिखाया
था जिंदगी क , ख , ग . आज कोशिश कि है कभी अपनी परछाई पे पाँव रखने
की, मुझे पसंद है परछाइयों का लम्बे होते जाना….
अंतिम भाग ( विस्थापन )
अपोलो , मैक्स , एम्स जैसे बड़े बड़े नाम हम
शहर वालो के लिए बने है , जिनका इलाज भी ब्रांड खोजता है . इन सब से अलग है हमारे
छोटे छोटे गाँवो में साईकिल पर अपना पूरा अस्पताल ले कर चलने वाले बंगाली डाक्टर .
हर मर्ज की दवा उनके बैग में होती है . हजारो तरह के देशी विदेशी सौन्दर्यप्रसाधनो
से भरे शोरुम्स की चमकदमक और उनमे अपने लिए खूबसूरती खोजते महिलाओं और पुरुषो
से इतर होती थी बितासिन चाची की टोकरी जिसमे होती थी खूबसूरती की हर सामान . छोटे से
आईने से लेकर थोड़ी सी रंगबिरंगी चूड़िया तक . 15 रुपय वाली लाली से ले कर 10 रूपये
वाली नाखूनी ( नेल पेंट ) तक . पर इन सब के बीच 2 चीज़े हर घर में ली जाती थी एक हम
बच्चो की कमर में बांधने के लिए काला धागे वाला करधनी और रंग गोरा करने के लिए फेयर
एंड लवली .
गाँव गाँव फेरी लगा कर साड़ी और कपड़े बेचने
वाले रज्जन जब अपनी गठरी 4 महिलाओं के बीच किसी दरवाजे पर खोलते थे तो उन से
निकलने वाली 110 रुपय की साड़ी को देख कर गया की दुल्हन के चेहरे पर जो
हुब्ब और खुशी की मिली जुली चमक आती थी आज माल में हजारो की शापिंग के बाद भी
शायद ही किसी चेहरे पर दिखे.
हैन्डपम्प में पानी भरने की लाइन में लगे लगे
ही हो जाता था मौन प्यार का इजहार . और अगर दोनों कुछ दर्जे पास हुए तो किताबो के या
किसी बच्चे के हाथो होता था कुछ पत्रों का आदान प्रदान . और एक दिन अचानक से
पता चलता था की लड़की शादी तय हो गयी है . गाँव , परिवार , समाज की इज्जत
के लिए दोनों चुपचाप अपने प्यार को दफना देते थे हरदम के लिए . और लड़का लग जाता
था पूरी शिद्दत से अपनी प्रेमिका की बारात की अगवानी के लिए , ताकि गाँव का नाम
न खराब हो .
और एक दिन!!!!! खुद को सुबह की भोर में
गाँव से शहर से जोड़ने वाली सड़क पर पाया . अब सोचता हूँ हमारे गाँव छोड़ने
से कौन कौन रोया होगा ?
शायद रोया होगा वो पीपल का पेड़ जिसकी
छांव में लगती थी हमारी “ क ,ख , ग “ वाली पहली क्लास , जिसे न जाने कब काट कर उसकी
जगह बन गया है पीले रंग का पंचायत भवन. सोचता हूँ उस पीपल की जड़ो की ही तरह कंही गहरे
तक धंसी हुयी है मेरी भी जड़े . भले ही पेड़ का अस्तित्व खत्म हो गया हो .
शायद रोये होगे वो तालाब और पोखर जिनमे
न जाने कितनी बार बिना कपड़ो की निसंकोच डुबकियाँ लगायी थी . और जो अब सुख गए हमारे
ही हालातो की तरह .
शायद रोया होगा गाँव के बहार वाला छोटा सा
जंगल . और आम अमरुद के बाग . जंहा न जाने कितनी दोपहरे गुजारी थी . वो जंगल वो
बाग धीमे धीमे कटते न जाने कब खेत और फिर घर बन गए .
शायद रोया होगा वो शिवाला जिसके अहाते में
खेलता था “ चुक चुक चलनी और आइस पाइस “ वो शिवाला भी अब शायद खंडहर हो
चला है वक्त के साथ साथ .
रोये होगे वो भैस , गाय और बैल जो हिस्सा थे
हमारे जीवन का . जो खेल खेल में अपनी पीठ पर करवाते थे प्यार से सवारी .
और जरुर रोई होगी वो लड़की ( जो अब
3 बच्चो की माँ और किसी की पत्नी और बहू है ) जिसके साथ साथ खेले थे , झगड़े किये थे
, चोरियां की थी , जानवर चराए थे , पाटी ले कर स्कूल गए थे और शायद पहला प्यार (तब
इस एहसास का नाम नही मालूम था ) भी किया था …..
गाँव से शहर की दौड़ चलती ही रही है,और
शहर में जाकर वापस गाँव में बसने के सपने भी, इन दो कमरे के फलैटों में, जमीन और आसमान
के बीच टंगे हुए,अक्सर सपने आते हैं कि,थोडा सेटल हो जाऊँ फिर लौटूंगा अपने गाँव, सरसों
के खेतो के बीच रोज सुबह,जा जा के कबूतर चुगाया करूंगा, शायद अमरीश पूरी की तरह आओ
आओ करके, और बनूँगा सामाजिक चेतना का प्रतीक, किसानो को दूंगा नए तौर तरीकों पे व्याख्यान,और
टूबल. कुण्डी के पास खाट डाल के, लिखूंगा ग्रन्थ भारत के किसानो की आर्थिक हालत पे,
गरीब बच्चों को पढ़ाया करूंगा, और दोपहर में किसी नीम के पेड़ के नीचे हुक्का और ताश
भी खेलूंगा…
इतने हसीं सपने, रोज टूट जाते हैं अलार्म के
साथ ही,और फिर वही टीडीएस क्लास जद्दोजहद शुरू,वही ऑफिस, वही कलीग, वही कांच के शीशे
वाली बिल्डिंगे और फिर वही शून्य में ताकते हुए,अपने गाँव वापस लौटने का सपना.......