सब कहते थे कि वो हवेली जैसा घर पाठक जी का है मैं हमेशा से उलट मानता था कहता था कितने पाठक आए और गए, ये घर पाठक जी का नही पाठक जी इस घर के हैं.....।
लोग कहते कि घर का तीसरा और आखिरी माला मेरा है और उसके बाद वो बड़ा सा घर खतम हो जाता है मेरा हमेशा मानना रहा कि पहला माला मेरा है और वहीं से उसके बाद दूसरों के माले शुरु होते हैं...... आखिरकार सबसे श्रेष्ठ तो सबसे ऊपर होता है....
मेरे लिए वो तीसरा माला ही सबकुछ था, दुनिया वहीं से शुरु होती है. वहीं मैं पैदा हुआ और होश संभाला. फिर मेरे घर के सामने की रोड जो आकर अकिल तिराहे में जुड़ती और फिर बस स्टाप की सड़क से होती हुई राजमार्ग पर और फिर सीधे शहर के बाहर..... वो राजमार्ग मुझे दिल्ली ले आया उस हवेलीनुमा मकान से शुरु होकर. वो गली मेरे लिए यहाँ तक आती है. लौट लौट कर मैं उस तक जाता हूँ. कभी सच में मगर रोज - यादों में, सपनों में......
माँ मायके से आई और घर में समा गई, जिसमे पाठक रहते हैं....हाँ, उसके लिए मकान हमारे घर पर समाप्त होता है....
बहुत बदला हमीरपुर. कई कुत्तों नें कई लोगों को काटा. सूखा पड़ा. बाढ़ आई. हैजा फैला. पाठक जी का मकान रुका रहा.....मेरे लिए "मकान का तीसरा माला" मेरे साथ दिल्ली तक आया.....और अब शायद विदेश तक जाएगा.....
बचपन में पढ़ी उस भूत की कथा याद आई जिसका हाथ बड़ा होता जाता था दूर का सामान पकड़ने को. मकान...जो मेरे घर से शुरु है, (और अब भी वहाँ है)... अजनबियों के इस देश में मेरा साथ निभाती आधी रात के अंधेरों में ढाढस बँधाता है.... हालाँकि मै खुशनसीब हूँ कि मै अभी अपने माँ पिताजी के साथ रहता हूँ...बचपन से अब तक.परिवार के साथ. कुछ दूर न लगता.
एक दिन लौट जाना है - उस तीसरे माले पर जहाँ से पाठक जी का मकान शुरू है. रास्ता याद दिलाती वो सीढ़ी...यही तो दिली इच्छा है मेरी. मेरी ही क्यूँ..हर उस शक्स की जो सीढ़ी से शुरु होकर दूर तक चला आया है.
सोचता हूँ क्या तीसरे माले का जीना मुझे यहाँ लाया या मैं उसको?
पशोपेश में हूँ. फिर लौटने की चाह और रुके रहने की मजबूरी के बीच झूलता मैं.
वो
अंदर वाले कमरे के दरवाजे पर
रात गये छ्म्म से कोई आवाज आना...
रोना, डरना
और
फिर माँ का पुचकारना....
अब तो सब
सपनों की बातें हैं....
पर......
मेरे साथ आज भी
वो रातें हैं...
लगता था दुनिया बस इतनी मेरे घर के आँगन जितनी,
जहाँ चाँद नजर आ जाता, जहाँ धूप देर से जाती....
जहाँ यारों का जमघट लगता....
जहाँ मैं इम्तेहान मे जगता....
जहाँ हमने सपने देखे.....
जहाँ से परदेश चले थे....
जिस आँगन मे मैं कभी खेला था.....
वहाँ रहता है सूनापन.... मेरा आँगन.....
लोग कहते कि घर का तीसरा और आखिरी माला मेरा है और उसके बाद वो बड़ा सा घर खतम हो जाता है मेरा हमेशा मानना रहा कि पहला माला मेरा है और वहीं से उसके बाद दूसरों के माले शुरु होते हैं...... आखिरकार सबसे श्रेष्ठ तो सबसे ऊपर होता है....
मेरे लिए वो तीसरा माला ही सबकुछ था, दुनिया वहीं से शुरु होती है. वहीं मैं पैदा हुआ और होश संभाला. फिर मेरे घर के सामने की रोड जो आकर अकिल तिराहे में जुड़ती और फिर बस स्टाप की सड़क से होती हुई राजमार्ग पर और फिर सीधे शहर के बाहर..... वो राजमार्ग मुझे दिल्ली ले आया उस हवेलीनुमा मकान से शुरु होकर. वो गली मेरे लिए यहाँ तक आती है. लौट लौट कर मैं उस तक जाता हूँ. कभी सच में मगर रोज - यादों में, सपनों में......
माँ मायके से आई और घर में समा गई, जिसमे पाठक रहते हैं....हाँ, उसके लिए मकान हमारे घर पर समाप्त होता है....
बहुत बदला हमीरपुर. कई कुत्तों नें कई लोगों को काटा. सूखा पड़ा. बाढ़ आई. हैजा फैला. पाठक जी का मकान रुका रहा.....मेरे लिए "मकान का तीसरा माला" मेरे साथ दिल्ली तक आया.....और अब शायद विदेश तक जाएगा.....
बचपन में पढ़ी उस भूत की कथा याद आई जिसका हाथ बड़ा होता जाता था दूर का सामान पकड़ने को. मकान...जो मेरे घर से शुरु है, (और अब भी वहाँ है)... अजनबियों के इस देश में मेरा साथ निभाती आधी रात के अंधेरों में ढाढस बँधाता है.... हालाँकि मै खुशनसीब हूँ कि मै अभी अपने माँ पिताजी के साथ रहता हूँ...बचपन से अब तक.परिवार के साथ. कुछ दूर न लगता.
एक दिन लौट जाना है - उस तीसरे माले पर जहाँ से पाठक जी का मकान शुरू है. रास्ता याद दिलाती वो सीढ़ी...यही तो दिली इच्छा है मेरी. मेरी ही क्यूँ..हर उस शक्स की जो सीढ़ी से शुरु होकर दूर तक चला आया है.
सोचता हूँ क्या तीसरे माले का जीना मुझे यहाँ लाया या मैं उसको?
पशोपेश में हूँ. फिर लौटने की चाह और रुके रहने की मजबूरी के बीच झूलता मैं.
वो
अंदर वाले कमरे के दरवाजे पर
रात गये छ्म्म से कोई आवाज आना...
रोना, डरना
और
फिर माँ का पुचकारना....
अब तो सब
सपनों की बातें हैं....
पर......
मेरे साथ आज भी
वो रातें हैं...
लगता था दुनिया बस इतनी मेरे घर के आँगन जितनी,
जहाँ चाँद नजर आ जाता, जहाँ धूप देर से जाती....
जहाँ यारों का जमघट लगता....
जहाँ मैं इम्तेहान मे जगता....
जहाँ हमने सपने देखे.....
जहाँ से परदेश चले थे....
जिस आँगन मे मैं कभी खेला था.....
वहाँ रहता है सूनापन.... मेरा आँगन.....