Thursday, 21 May 2015

ट्वीटर बाजी...और वहाँ के ट्वीपल

ट्वीपल्स को उनके ट्वीट-कर्म के आधार पर निम्न श्रेणियों में बाँट रहा हूँ -

1. कट्टर पंथी ट्वीपल: ये ऐसे लोग होते हैं जिन्हें अपनी वाल पर दूसरे की पोस्ट गंवारा नहीं होती। क्या मजाल किसी की जो इनकी दीवार को छू सके। ऐसी सेटिंग लगा देते हैं कि आप इनकी टीएल पर कुछ भी टैग, शेयर आदि नहीं कर सकते। परन्तु जब इनको कोई उपलब्धि बतानी होती है तो जबरदस्ती आपको टैग कर देते हैं। ये अपने से लोप्रोफाइल वाले ट्वीटर बाजों की पोस्ट पर कभी आरटी या कमेन्ट नहीं करते, हाँ ट्वीट बहुत अच्छा हुआ तो फेव करके रख लेगें ताकि भविष्य में कापी मारने के काम आए.. जबकि आपसे यह उम्मीद करते हैं कि इनकी घटिया से घटिया पोस्ट पर भी आप शानदार कमेन्ट और आरटी दें। जिससे इनकी गरिमा में श्री वृद्धि हो। ऐसा नहीं कि ये बिरादरी किसी की पोस्ट शेयर नहीं करती। करती है, अपने से हाई प्रोफाइल वालों की। उनके सम्मान में कसीदे गढ़ते हुए। ऐसे लोग प्रायः सामान्य जीवन नहीं जी पाते हैं।

2. उदार पंथी ट्वीटरबाज: ये उदार हृदय वाले लोग होते हैं जो दूसरे की पोस्ट को बिना किसी झिझक के अपनी टीएल पर शेयर कर लेते हैं। कमेन्ट करते हैं आरटी करते हैं। ऐसे लोग प्रायः साहित्यकार नहीं होते। इनको पब्लिक फीगर बनने की चाह भी नहीं होती। ये किसी गुट विशेष से ताल्लुक नहीं रखते। ये प्रायः सामान्य जीवन जीने वाले लोग होते हैं।

3. स्वार्थी ट्वीपल: ये आपकी पोस्ट को आरटी इसलिए नहीं करते कि आपकी पोस्ट बहुत बढ़िया है, बल्कि इसलिए कि आप भी इनकी पोस्ट को आरटी करें। यदि कुछ दिनों तक आपने रिस्पोंस नहीं दिया तो ये आपको अनफौलो भी कर सकते हैं।

4. छद्म ट्वीटरबाज: ये उँगलीबाल लोग होते हैं जो छद्म नामों से अपनी प्रोफाइल बनाते हैं फिर किसी गुट विशेष को निशाने पर लेते हुए उसकी भरसक आलोचना करते हैं। ऐसे ट्वीपल प्रायोजित भी होते हैं।

५. कापी-पेस्ट महाराज: ये वो ज्ञानी होते हैं जिनका सारा धंधा कापी पेस्ट पे ही चल रहा है, यहाँ आपने अच्छा ट्वीट किया वहाँ कापी हुआ और हाँ इन्हे मौलिक ट्वीट से ज्यादा आरटी भी मिलते हैं, ये प्रजाती ट्वीटर पे सर्वाधिक पायी जाती है...

६. फ्रेस ट्वीपल: ये  New ज्वाइनी होते हैं ये आपको फालो करते हैं या नही भी करते हैं, और फेसबुक के मोहपास से बँधे होने के कारण,इन्हे आरटी नामक ज्ञान नही होता है तो फेव करके निकल लेते हैं.

एक बात जो सभी ट्वीटरबाजों मे समान है कि शायरीयाँ, कविताएँ और ज्ञान सभी ट्वीपल की टीएल पे मिलेगा..

मैं उपरोक्त में किस श्रेणी का ट्वीटरबाज हूँ यह निष्कर्ष मैं आपको क्यों बताऊँ? क्योंकि निष्कर्ष हमेशा खुद को परे रखकर ही दिया जाता है। अलबत्ता यह जरूर बताना चाहूँगा कि ट्वीटर ने मुझे बहुत कुछ दिया है तो काफी कुछ छीना भी है।

Monday, 18 May 2015

बकचोद मंत्रालय

अपने देश में बकचोदों की बढ़ती संख्या, समाज में उनके महत्त्व, देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि में उनके अमूल्य और अपरिहार्य योगदान को देखते हुए यह समीचीन रहेगा कि सरकार अलग से बकचोद मंत्रालय स्थापित करे, क्यूँकि बकचोदी की कला अब चाय की दुकानो से उठकर कॉमेडी शोज के रूप में पूर्णतः सामाजिक हो चुकी है। अब तो बड़े-२ कलाकार भी अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिए बकचोदी वाले कार्यक्रम करके जनता के पैसे का चूतिया काट रहें हैं।

लोग पूछेंगे कि बकचोद मंत्रालय बनने से शासन और समाज को क्या लाभ होगा? तो हमारा मंतव्य है कि बकचोदों के पंजीकरण और विनियमन से शासन को कम से कम यह तो पता रहेगा कि अमुक-अमुक इलाके में और अमुक-अमुक कोटि-कैटेगरी के इतने बकचोद यहाँ-यहाँ हैं, इस कॉमेडी शो मे इतने बकचोद फलाँ-२ कैटेगिरी मे प्रतिष्ठित हैं, ट्वीटर पे इतने फेसबुक पे इतने, चाय की दुकान में इस प्रकार के हैं। मंत्रालय की वेबसाइट पर बड़े-२ बकचोद लोगों के ब्यौरे होंगे।

तब देश के जिस नागरिक को जो सुविधा या सेवा चाहिए होगी, या जिस बकचोदी से निजात पानी होगी वह उसके अनुरूप बकचोदों की जानकारी वेबसाइट से ही पा लेगा। अभी तो बकचोदों का सारा कारोबार बसों, चाय की दुकानों,या सार्वजनिक मूत्रालयों में चस्पा पैंफलेटों के ज़रिए, सोशल मिडिया और थोड़ा बहुत कॉमेडी शो और चेलों-चपाटों की जबानी किए गए प्रचार के भरोसे चलता है। तब बकचोदों को भी फायदा, लोगो को बकचोदी का ज्ञान ओर देश की सरकार को चूतिया बनाने के वक्तव्य, मतलब एक ही मघ्घे से तीन गाँड धुल जाएँगी...

अपने देश के अनपढ़ और गंवार लोग ही नहीं, लोडें लफाड़ी ही नही बल्कि बड़े-बड़े नेता, कलाकार, मंत्री, अधिकारी आदि भी बकचोद हैं या बकचोदों की चरण-रज लेने जाते हैं। यह तो पक्का है कि ऐसा करने से समाज के इन शिरोमणियों का कल्याण होता है, नहीं तो बकचोदी अचानक से प्रतिष्ठावान हो जाती और बकचोदों की इतनी पूछ क्यों होती? एक बार जब बकचोद मंत्रालय बन जाएगा, तो ऐसे समाज-शिरोमणि लोग मंत्रालय में ही अलग से बकचोदी कॉन्क्लेव बनवा सकते हैं और ज़रूरत के अनुसार, बिना कोई समय गँवाए अपना उल्लू सीधा करने के लिए बकचोदी के चरणों की भभूत अपने माथे पर लगाकर मनचाहे तरीके से सामने वाले को बातों मे घेरकर चूतिया काट सकतें हैं।

अब मैं भी सोच रहा हूँ कि किसी बड़े बकचोद के शरणार्थ होकर "अथातो बकचोदी जिज्ञासा" पूरी करके अपने स्वार्थों को यहीं हिल्ले लगाऊँ...

Monday, 11 May 2015

मदिरा, सुरा या शराब

मेरे एक मित्र बोले पाठक कुछ मदिरा पे लिखो, मैने सोचा ये तो अत्यंत कठिन है, फिलहाल न तो मैं "हरिवंश राय बच्चन" हूँ, और न ही मेरी औकात है मधुशाला जैसा कुछ लिख पाने की।

पर हमेशा की तरह मेरा घमंडी स्वभाव आड़े आ गया कहा नही पाठक बेटा लिखना तो पड़ेगा नही तो स्वाभिमान कहाँ ढूंढेगा, बड़ा आया कविता लिखता हूँ, ब्लाग लिखता हूँ, फलाना ढिमकाना।

बस उसी कारण कुछ अलल्म गल्लम जो मन में आया लिख दिया अब बस प्रतीक्षा है, कि उन मित्र को पसंद आ जाए..

ये रहीं कुछ पंक्तियाँ मेरे अनुसार मदिरा के लिए...


मैं इसे ठंडी बर्फ और
सुन्दर गिलास मे रखता हूँ
एक समय के एहसास के लिए
पर यह दे जाती है यादें!

कह ही जाती है हर बार
मैं तुमसे विमुख नहीं
न तुम मुझसे हो!!
लेकिन एक परछाँई है अपराध की
लोगों की नजर में
जो
हमारे विकसनशील संबंधों पर मँडराती है!!

मदिरा के संकल्प
हमारे संकल्पों से कम वेगवान नहीं हैं
उसकी सत्ता भी तो
हमारे ही रूपाकार में व्यक्त है, सत्य है!

यह भी ऐसा मानती है!! है न??

कभी-कभी तो
पीछा करने लगता हूँ
कि ठीक-ठीक कहाँ से बरसता है
मदिरा रस
गिलास की चमक से या
गर्म-ठंडी बर्फ से,
किसी के खिले हुए होंठों से या
प्रेयसी की खुली उजली बातों से।

इसके रंगों भरे पारदर्शी प्रेम में
जाग रहा हूँ मैं।

अपनी गहरी आकांक्षाओं से
विकल हूँ।

Monday, 4 May 2015

स्वयं से स्वयं तक स्वयं की प्रतीक्षा में

अपने विषय मे मुझे कोई मीठा भ्रम नही है। यों भी हिन्दी जगत में लेखकों और मेरे जैसे बेकार के प्राइवेट कर्मचारियों को अपने बारे में खुशफहमियाँ बुढापे मे ही होती हैं, जवानी में पैदा तो हो जाती हैं पर विकसित बुढ़ापे मे ही होती हैं।


ये भ्रम कि मैं हिंदी को दिशा प्रदान करने के लिए जन्मा हूँ, मेरे नाम से एक युग संबोधित होगा, सब पर छा जाउँगा आदी मुझे नही हैं, और न रहेंगे।


यह नम्रता नही सच है कि हिन्दी के वर्तमान ग्रुपफोटो मे मैं बिल्कुल पिछली पंक्ति में खड़ा हूँ, गरदन ऊँची कर दूसरों के कँधों के बीच कहीं झाँक रहा हूँ।


चित्र देखने वाले को मुझे जानना ज़रूरी नही है, मेरी कोई रचना ऐसी नही है जिसपे बात की जाए, फिलहाल मुझसे उम्मीद करना भी बेकार है।


इसका अर्थ यह बिल्कुल नही की मैं किसी हीन भावना से पीड़ित हूँ। जब मौका लगता है रौब मार लेता हूँ, प्रायः नयी स्कीमें गढ़ता हूँ, रोज कोई संकल्प लेता हूँ, पर वास्तविकता यह है कि मुझमे आलस और अक्षमता का ऐसा मधुर सम्मिश्रण कलात्मक अनुपात में हुआ है कि स्कीम तजना और संकल्प भुलाना मेरी आदत हो गयी है।


इधर कुछ वर्षों में मैनें लेखन को गंभीरता से लिया, कुछ छोटी मोटी रचनाएँ मैने लिखीं पर वह कोई खास नही है, मुझे खुद भी ज्याद पसंद नही है, मुझे ठीक से लिखना नही आता। मुझे न आलोंचको ने सम्मान दिया न रद्दी वालों ने, क्यूँ कि न मैने अच्छा लिखा न ज्यादा।


मेरे पास गलतफहमी मे जीने के कुछ कारण थे पर मैने उन्हे नहीं माना, जैसे मेरे पिता शिक्षक थे और भाई भी दिमाग का तेज था तो मुझे भी होना चाहिए। हमारे पुरे परिवार में शनि का कोई चक्कर तो था, माता जी मानती थीं पूजा पाठ करती रहती, कुण्डलियाँ दिखाती, पिताजी के स्वास्थ्य की और हम भाई बहन की भविष्य के चक्कर में।


हम कुल तीन भाई बहन हैं, सब एक दूसरे से प्रकृति में अलग हैं। छोटे थे तो मारपीट करते थे अब एक दूसरे को बेवकूफ समझते हैं। सबका अपना व्यक्तित्व, अपनी भाषा व अपना कार्यक्षेत्र है। मैं थोड़ा अक्खड़ था थोड़ा अलगाव वादि, इसलिए सड़कों पे घुमना और दोस्तों के यहाँ घुमना मेरा शगल बन गया था।


मेरे पिताजी ने मुझे सुधारने के लिए विशेष ध्यान दिया। उन दिनों पिताओं के पास बेंत रूपी जादुई छड़ी होती थी सुधारने के लिए। महिने में एक बार कम से कम बड़े पैमाने पर मेरे सुधार का धुआँधार समारोह होता था, कभी-२ रिश्तेदार भी मेरे पिता को खुश रखने के लिए मुझे पीट देते थे। विद्यालय में शिक्षकों को हमें पीटने के ही आधे पैसे मिलते थे कम से कम मुझे ऐसा ही लगता था, ऐसे शिक्षक की बड़ी प्रशंसा की जाती थी हमारे घर में।


आज सोचता हूँ कि अगर इतना किसी थाने या नारे लगाने के कारण कोतवाली में पिटा होता जितना घर या विद्यालय में पिटा हूँ तो नेता होता या सरकार से आवेदन करके ८-१० एकड़ जमीन अपने नाम करवा लेता।


मैं खोखलेपन व इज्जत नाम के दिखावटी राक्षस से दूर रहता हूँ, क्यूँकि मैनें बचपन से कोई २० वर्ष तक जब तक मैं अपनी उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ नही आ गया तब तक एक खुशहाल परिवार के अंदर से जर्जर होने की लंबी कहानी देखी है।

यह मध्यमवर्ग किस प्रकार अंदर से खोखला रह कर ऊपर से पॉलिश करता है टीवी का वाल्यूम बढ़ा कर बीवी से झगड़ा करता है, घर का चूल्हा सही से न जले खिड़कियों से हवन का धुआँ निकलना चाहिए, लड़के की शादी में रौला होना चाहिए। हमारी यहाँ ऐसी इज्जत है वहाँ वैसा सम्मान है, कोई जाने का तो क्या कहेगा।

ज्योतिषी पत्री देखकर बताते कि एक साल का कष्ट और फिर अगले वर्ष सब ठीक पर ऐसा साल कभी आता नही है। ऐसी संकीर्ण सोच और मध्यम वर्ग का सिर्फ दिखावटी सम्मान मुझे विचलित करता था।

इस दकियानुसी समाज में भुला देने की बात तभी शुरू हो गयी थी जब पिताजी कि इच्छा विरुद्ध मैनें सरकारी नौकरी न करने का प्रण किया, मुझे नही समझ आते दिखावटी सम्मान वाले लोग।


फिर अपना मैनेजमेंट का कोर्स करते हुए जाना कि यह समाज तो और दिखावटी और खुदगर्ज है तब मैने सीखा कि अपनी तकलीफ भुलाने का एक ही तरीका है कि समाज मे बहुत गहरे चले जाओ और भूल जाओ। भीड़ में रहो ताकि मन की वीरानी दूर हो, ठहाके लगाओ जिससे आँसू सूख जाएँ।

मेरी तीन आदतें हँसना, भटकना और लिखना इसी बीच पनपी।


फिर इसी बीच मैं एक प्राइवेट संस्था मे काम करने लगा वह भी वित्तीय विभाग मे कहने को, य़हाँ हमारी प्रेमिका बनी और कुछ आय का साधन भी फिर धीरे-२ आय बड़ी और कुछ घर पैसे बचा के भेजने लगा इसी बीच प्रेमिका छोड़ गई, खैर छोडिए यह कहानी वहाँ ज्यादा ताल्लुक नही रखती है।


दिल्ली मे रहकर समझ आ गया कि समाज सिर्फ दिखावटी ढकोंसलो से चल रहा है, तो हिन्दी में कुछ लिखना शुरू किया। तब समझ मे आया हिन्दी मे लिखना खुद अपना दर्जा गिराने जैसा रहा है, पिछले कुछ दशकों मे यह एक घटिया विद्या मानी जाती रही है। हमारे पढ़े समाज के लोग अँग्रेजी में पढ़ते हैं न!!


मैं हमेशा से ईमानदार रहना चाहता हूँ, यश, सुविधा सब खोकर भी, मगर ईमानदारी इस समाज में किसी जिद से नही आती, वह भी सच्चाई जानने के बाद निश्चित की जाती है, इसलिए मुझे लगता है मेरी मूर्खता भरी यात्रा लंबी है।


अभी तक जो मेरा मन आया वह नही लिख पाया या यह कहूँ व्यक्त नही कर पाया, मेरे अनुभव व अनुभूत कड़वाहटें, वह एक सकल पूँजी डिपाजिट पड़ी है। उसे व्यक्त कर पाऊँ तो कुछ संतोष होगा। इधर जिंदगी मे कुछ ठहराव है, उससे उभरना है। कल को शव भी तो छोड़ना है बोझ लेकर कहाँ जाऊँगा।।


उपरोक्त बातें केवल मेरे व्यक्तिगत जीवन या लेखन से शायद न भी जुड़ी हों, इनमें अगर कुछ आपको अन्यत्र मिलता है तो आप गाली देने के लिए स्वतंत्र हैं ......!!

आपकी अपनी राय है....!!