Monday, 17 August 2015

सरकारी स्कूलों में बच्चे क्यों नहीं पढ़ाते सरकारी कर्मचारी?

सरकारी यानी घटिया!



चलिए शुरूआत करते हैं एक सच्ची कहानी से:



तमिलनाडु के एक पिछड़े ज़िले इरोड के ज़िलाधीश यानी कलेक्टर  ने अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में भर्ती करवाया है. जब वे इस स्कूल में अपनी बच्ची के दाखिले के लिए पहुँचे तो दूसरे माँ-बाप की तरह कतार में खड़े हुए.



दिल्ली के एक अख़बार में इस ख़बर का प्रकाशित होना ही साबित करता है कि यह कुछ असामान्य सी बात है. यक़ीनन ज़िलाधीश को उनके साथी अधिकारियों ने समझाया भी होगा. लेकिन वे नहीं माने. उन्होंने अख़बार से भी बात करने से इनकार कर दिया कि ये उनका निजी फ़ैसला है.किसी अफ़सर की बेटी सरकारी स्कूल में, आम लोगों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकती है?



वहाँ किसानों और मज़दूरों के बच्चे पढ़ते हैं, उस सर्वहारा वर्ग के बच्चे जिनके लिए दो जून की रोटी के बाद इतना पैसा बचता ही नहीं कि वे सरकारी स्कूल के अलावा कहीं और अपने बच्चे को पढ़ा सकें.



अब सरकारी स्कूल में किसी अफ़सर, नेता, व्यापारी, उद्योगपति, डॉक्टर और ऐसे ही किसी ऐसे व्यक्ति के बच्चे नहीं पढ़ते जो उच्च या मध्यवर्ग में आते हैं. जो महंगे निजी स्कूल में नहीं जा सकते वो किसी सस्ते निजी स्कूल में जाते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में नहीं जाते.



ठीक वैसे ही जैसे इस वर्ग के लोग और उनके रिश्तेदार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए नहीं जाते. एम्स और पीजीआई जैसे कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन वहाँ भी वो तब जाते हैं जब जेब जवाब दे जाती है या और कोई चारा नहीं होता.



वो सरकारी बसों में नहीं चढ़ते, सरकारी डाक व्यवस्था के इस्तेमाल को भरसक टालते हैं. वो सरकारी कंपनियों के उत्पाद नहीं ख़रीदते यहाँ तक कि टेलीफ़ोन जैसी सुविधा में भी निजी कंपनी को तरजीह देते हैं.



सरकारी के नाम पर वे रेल और सड़क जैसी गिनी चुनी चीज़ों का ही इस्तेमाल करते हैं. वो भी इसलिए कि उसका विकल्प नहीं है.



एक प्रोफ़ेसर का आकलन है कि संपन्न वर्ग को तो छोड़ दीजिए अब मध्यवर्ग के लोग भी हर उस सुविधा के इस्तेमाल को अपनी तौहीन समझते हैं जो सरकारी है.



हालात इतने ख़राब हैं कि यदि कोई व्यक्ति पैसा खर्च करने में ज़रा सा भी सक्षम है तो वह सरकारी कंडोम पर भी भरोसा नहीं करता.



वैसे तो ये सरकार के लिए चिंता की बात होनी चाहिए लेकिन सरकार को चलाने वाले राजनेता और अधिकारी दोनों को इसकी चिंता नहीं दिखती.



न्यायालयों को इस बात पर चिंता ज़ाहिर करते नहीं देखा कि सरकारी स्कूल इतने बदहाल क्यों है कि हर कोई अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतराता है. भेजता वही है जिसके पास विकल्प नहीं है या दोपहर को मिलने वाले उस भोजन की चिंता है जो न्यायालय के कहने पर सरकारी स्कूलों में बाँटा जा रहा है.



आज से दो दशक पहले स्थिति इतनी ख़राब नहीं थी. यक़ीन न हो तो उन राजनेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों से बात करके देखिए जो आज से बीस साल पहले किसी छोटे शहर के प्रायमरी स्कूल में पढ़ते थे. उनमें से अधिकांश आपको किसी न किसी सरकारी स्कूल में पढ़े हुए मिल जाएँगे. उनका जन्म किसी न किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होगा.



लेकिन आज क्या वे अपने बच्चों का जन्म किसी सरकारी अस्पताल में होने की कल्पना कर सकते हैं? क्या वे अपने बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजेंगे?



ये आज़ादी के बाद के पाँचवें और छठवें दशक में सरकारी व्यवस्था में हुए पतन का सबूत है. ये सरकारी प्रश्रय में निजी व्यवसाय के पनपने का सबूत भी है. ये नेहरू के समाजवादी भारत का मनमोहन सिंह के पूंजीवादी भारत में तब्दील हो जाने का सच है.



हमने अपनी आँखों से देखा है कि सरकारी अमला किस तरह से एक सरकारी व्यवस्था को धीरे-धीरे इसलिए ख़राब करता है ताकि उसके बरक्स निजी बेहतर दिखने लगे और आख़िर सरकारी व्यवस्था दम तोड़ दे या फिर उसका निजीकरण किया जा सके.



तमिलनाडु के ज़िलाधीश की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरु कर दी है. पक्का है कि अगर ज़िलाधीश की बच्ची वहाँ दो चार साल पढ़ पाई तो उसका नक्शा और स्तर सब बदल जाएगा.



लेकिन यह एक अपवाद भर है.



परिस्थितियाँ तो उस दिन बदलेंगीं जिस दिन हर राजनेता और अधिकारी अपने बच्चों को ऐसे ही सरकारी स्कूलों में भेजने का फ़ैसला कर ले.



यह समय है जब हम भ्रष्टाचार जैसी व्यापक समस्या के बारे में बात करते हुए ये भी सोचें कि जो कुछ भी सरकारी है वह धीरे-धीरे निकृष्ट क्यों होता जा रहा है और सिवाय सरकारी नौकरी के.



हम सब चुप क्यों हैं?

सरकारी स्कूलों के स्तर गिरने की एक वजह यह है कि मध्यवर्ग ने उससे मुंह मोड़ लिया है. मगर इसका एक छिपा हुआ पहलू भी है. आज सरकारी स्कूलों में ज़्यादातर आदिवासी, दलितों और अन्य पिछड़े व ग़रीब तबके के बच्चे दिखाई देते हैं. ये बच्चे तब कहां थे जब इन स्कूलों में आज़ादी के बाद उभरे पहले मध्यवर्ग के बच्चे पढ़ रहे थे? और अब जब उनके पढ़ने की बारी आई तो सरकारी स्कूलों का स्तर गिर गया या गिरा दिया गया!



सरकारी मतलब घोटाला, ग़ैर ज़िम्मेदारी, कोई जवाबदेही नहीं. इसलिए लोग डरते हैं सरकारी सुविधाओं से. मगर सरकारी नौकरी मतलब यही फ़ायदे. इसलिए लोग सरकारी नौकरी चाहते हैं. स्वामी रामदेव और अन्ना जैसे लोग घोटाले रोकने और जवाबदेही के लिए क़ानून की बात करते हैं तो वह अलोकतांत्रिक है. वाह रे सरकारी सुविधाएँ और सरकारी लोकतंत्र..



जब ब्रिटेन की महारानी ने भारत की आज़ादी की घोषणा की उससे पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने उनसे कहा था कि वे ऐसा न करें. उनका कहना था कि अगर भारत को आज़ाद किया जाएगा तो इसका मतलब है सत्ता चोर और लूटेरों के हाथों में सौंपना. आज लगता है कि चर्चिल की सलाह 101 प्रतिशत सही थी।



खैर मुझे इन सबसे क्या मैं एक जागरूक भारतीय हूँ, देशभक्त हूँ, खुद सरकारी विद्यालय में पढ़ा हूँ, पर मेरा बच्चा तो कांनवेंट में ही पढ़ेगा जी और हाँ वो डाँस कम्पटिशन में हिस्सा लेगा, गाया गाएगा, क्रिकेट खेलेगा, IIT or IIM मे जाएगा, विदेश घुमेगा, सरकारी नौकरी करेगा तो बड़ी कमाई वाली और हाँ जी देखो आर्मी और साधारण और ईमानदार पोलिस की बात मत करना उसमें कमाई कहाँ?



देशभक्ति के लिए औरों के लड़के बच्चे हैं मैने तो इतना कमा लिया है जी की सुख चैन से रहे।चलो चलते हैं भैया कहाँ बेकार की बातों में खींच लिया, इससे देश का कुछ नही होने वाला।

Bye take care!!

Get well soon INDIA..

Wednesday, 5 August 2015

यादें किशोर दा की


जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से! अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं तो चलो करते है कुछ समय किशोर दा के नाम:
Tuesday August 04, 2015
यादें किशोर दा की : पेश है उनके जन्मदिन पर किशोर दा 2011 अगस्त में मैंने खंडवा की सैर की इस महान विभूति के अनछुए पहले जानने के लिएउनके जन्म दिन के अवसर पर आज पेश है उन्हीं के जीवन के अंश
किसने जाना था कि एक छोटे से शहर 'खंडवामे पैदाइश लेने वाला 'आभास कुमार गाँगुलीनाम का बालक भारतीय संगीत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ जाएगा। १९४८ में खेमचंद्र प्रकाश की संगीत निर्देशित फिल्म जिद्दी में अपना पहला गीत'मरने की दुआएँ क्यूँ मागूँसे लेकर अक्टूबर १९८७ में 'वक़्त की आवाज़में आशा जी के साथ गाए गीत 'गुरु गुरु..' तक अपने चालीस साल के संगीत सफ़र में किशोर दा ने संगीत प्रेमी करोड़ों भारतीयों का दिल जीता और आज भी जीत रहे हैं। किशोर कुमार को जब उनके बड़े भाई अशोक कुमार एक अभिनेता बनाने के लिए मुंबई लाए तो किशोर दा, मन ही मन कोई ख़ास उत्साहित नहीं थे। उनका तो सपना अपने उस वक़्त के प्रेरणास्रोत के एल सहगलसे मिलने का था जो दुर्भाग्यवश पूरा नहीं हो पाया क्योंकि इनके मुंबई आगमन के कुछ ही दिन पश्चात सहगल चल बसे। 


अपने शुरुआती दिनों में के एल सहगल के अंदाज का अनुकरण करने वाले किशोर दा की गायिकी में एक ख़ूबसूरत मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात एस डी बर्मन साहब से हुई। ये भी एक संयोग ही था कि बर्मन सीनियर, अशोक कुमार जी के घर पहुँचे और किशोर को बाथरूम में गुनगुनाते सुन कर ठिठक गए और उनसे मिल कर जाने का ही निश्चय किया। उन्होंने ही किशोर को गायन की अपनी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया। किशोर दा की जिस आवाज़ के हम सब क़ायल हैं, वो पचास के उत्तरार्ध में एस डी बर्मन के सानिध्य का ही परिणाम रहा है। 


अग़र बाकी गायकों की अपेक्षा किशोर दा के योगदान पर विचार करूँ तो यही पाता हूँ कि जहाँ रफी ने गायिकी में अपनी विविधता से सबका मन जीता, वहीं किशोर दा ने हिंदी फिल्म संगीत की गायिकी को आम जनता के होठों तक पहुँचाया।उनकी गायिकी का तरीका ऍसा था कि जिसे गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए अपेक्षाकृत अधिक सहज है। दरअसल किशोर, मुकेश और हेमंत दा सरीखे गायकों ने अपनी आवाज़ के बलबूते पर ही संगीतप्रेमी जनमानस को अपना दीवाना बना लिया। मोहम्मद रफी और मन्ना डे जैसे गायक दिलकश आवाज़ के मालिक तो थे ही, पर साथ-साथ वे शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने के बाद हिंदी फिल्मों में पार्श्व संगीत देने आए थे। किशोर दा के पास ऍसी काबिलियत नहीं थी फिर भी इसकी कमी उन्होंने महसूस नहीं होने दी और अपने मधुर गीतों को हमें गुनगुनाने पर मज़बूर करते रहे। 


पचास का दशक किशोर के लिए बतौर गायक काफी मुश्किल वाला समय रहा। इस दौरान उन्होंने कई फिल्में की जिनमें 'नौकरी', 'मिस माला', 'बाप रे बाप', 'आशा', 'दिल्ली का ठग' और 'चलती का नाम गाड़ीचर्चित रहीं। नौकरी फिल्म में एक गीत था 'छोटा सा घर होगा...' जिसे संगीतकार सलिल चौधरी, हेमंत दा से गवाना चाहते थे। किशोर दा ने जब इसे खुद गाने की पेशकश की तो सलिल दा का सीधा सा जवाब था ... 

"जब मैंने तुम्हें कभी सुना ही नहीं तो ये गीत तुमसे कैसे गवा लूँ।"


बड़े मान-मुनौवल के बाद सलिल दा राजी हुए। ये वाक़या इस बात को स्पष्ट करता है कि वो समय ऍसा था जब ज्यादातर संगीत निर्देशक किशोर की आवाज़ को गंभीरता से नहीं लेते थे।


बतौर नायक किशोर कुमार का ये समय ज्यादा बेहतर रहा। १९५६ में जे के नंदा की फिल्म 'ढ़ाके का मलमलमें पहली बार वो और मधुबाला साथ साथ देखे गए। शायद इसी वक़्त उनके प्रेम की शुरुआत हुई। १९५८ में फिल्म 'चलती का नाम गाड़ीइस जोड़ी की सबसे सफल फिल्म रही। इस जोड़ी पर फिल्माए गीत 'इक लड़की भीगी भागी सी...' और 'पाँच रुपैया बारह आना....' इसी फिल्म से थे। १९६१ में अपनी पहली पत्नी रूमा गुहा के रहते हुए किशोर ने मधुबाला से शादी की और इसके लिए मुस्लिम धर्म को अपनाते हुए अपना नाम अब्दुल करीम रख लिया। ज़ाहिर है ये सारी क़वायद दूसरी शादी करने में कानूनी पचड़ों से बचने के लिए की गई थी।
वापस बढ़ते हैं किशोर दा के संगीत के सफ़र पर। संगीतकारएस. डी. बर्मन पहले ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने ये समझा कि किस तरह के गानों के लिए किशोर की आवाज सबसे ज्यादा उपयुक्त है। उन्हीं की वज़ह से साठ के दशक में किशोरदेव आनंद की आवाज़ बने। बरमन सीनियर द्वारा संगीत निर्देशित 'गाइडऔर 'जेवल थीफमें उनके गाए गीतों ने उनके यश को फैलने में मदद की।


पर किशोर की गायिकी के लिए मील का पत्थर साबित हुई १९६९ में बनी फिल्म 'अराधना'
एस डी बर्मन साहब इस फिल्म के गीत रफी साहबसे गवाने का मन बना चुके थे। पर धुनें बना चुकने के बाद वो बीमार पड़ गए और इसके संगीत को पूरा करने की जिम्मेवारी पंचम दा पर आन पड़ी। उन्होने इन धुनों को गाने के लिए किशोर दा को चुना और उसके बाद जो रच कर बाहर निकला वो इतिहास बन गया। इस फिल्म के गीत 'रूप तेरा मस्ताना...'के लिए किशोर दा को पहली बार फिल्मफेयर एवार्डसे नवाज़ा गया।


सत्तर के दशक की शुरुआत किशोर दा के लिए जबरदस्त रही। एस. डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में 'शर्मीली' और 'प्रेम पुजारी' के गीत चर्चित हुए। वहीं 'अराधना', 'कटी पतंग' और 'अमर प्रेम' की अपार सफलता के बाद किशोर दा पर्दे पर राजेश खन्ना की स्थायी आवाज़ बन गए।
सत्तर का दशक किशोर कुमार की गायिकी के लिए स्वर्णिम काल था। इस दशक में गाए हुए गीतों में से कुछ को छांटना बेहद दुष्कर कार्य है। कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1971),बुढ्ढा मिल गया(1971), मेरे जीवन साथी (1972), परिचय (1972), अभिमान(1973), कोरा कागज़(1974), मिली(1975), आँधी(1975), खुशबू(1975) में गाए किशोर के गीत मुझे खास तौर से प्रिय हैं।


पहले देव आनंद और फिर राजेश खन्ना को अपनी आवाज़ देने के बाद इस दशक में वो अमिताभ को भी अपनी आवाज़ देते नज़र आए। किशोर हर अभिनेता की आवाज़ के हिसाब से अपनी वॉयस माडुलेट करते थे। इस दौर में किशोर ने बड़े संगीतकारों में बर्मन सीनियर, पंचम, कल्याण जी-आनंद जी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ काम करते हुए फिल्म जगत को कई अनमोल गीत दिए।
चाहे वो 'बुढ्ढा मिल गया 'का रूमानी गीत 'रात कली इक ख़्वाब में...' हो या यूडलिंग में उनकी महारत दिखाता 'मेरे जीवन साथी ' का 'चला जाता हूँ किसी की धुन में...' या फिर दर्द में डूबा 'मिली' में गाया हुआ 'बड़ी सूनी सूनी है..... ' या 'आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन....' सब के सब किशोर दा की गायन प्रतिभा में विद्यमान हर रंग की उपस्थिति को दर्ज कराते हैं।

किशोर दा के सबसे सुरीले गीत एस. डी. बर्मन और पंचम दा के साथ हैं। पंचम को जब भी अपनी किसी फिल्म के लिए किशोर दा से गाना गवाना पड़ता था तो उसके दो दिन पहले उस गीत की धुन का टेप वो उनके यहाँ भिजवा देते थे। वे कहते थे कि इससे किशोर को गीत को महसूस करते हुए जज़्ब करने में सहूलियत होती थी और वास्तविक रिकार्डिंग का परिणाम बेहतरीन आता था।

फिल्म उद्योग में ये बात आम है कि किशोर का व्यवहार या मैनरिज्म अपने मिलने वाले लोगों से बहुधा अज़ीब तरह का होता था। ऍसा वो कई बार जानबूझ कर करते थे पर कहीं कहीं उनका दिल, शरारती बच्चे की तरह था जो उनके दिमाग में नए-नए खुराफातों को जन्म देता था। अक्सर उनके इस नटखटपन का शिकार, उनके क़रीबी हुआ करते थे।आइए रूबरू होते हैं उनके ऍसे ही कुछ कारनामों से
..
एक बार की बात है, किशोर के घर एक इंटीरियर डेकोरेटर पधारा। वो सज्जन तपती गर्मी में भी थ्री पीस सूट में आए, और आते ही अपने अमेरिकी लहजे के साथ शुरु हो गए किशोर को फंडे देने कि उनके घर की आंतरिक साज सज्जा किस तरह की होनी चाहिए। किशोर ने किसी तरह आधे घंटे उन्हें झेला और फिर अपनी आवश्यकता उन्हें बताने लगे।

अब गौर करें किशोर दा ने उन से क्या कहा....


"
मुझे अपने कमरे में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस चारों तरफ कुछ फीट गहरा पानी हो और सोफे की जगह छोटी-छोटी संतुलित नावें, जिसे हम चप्पू से चला कर इधर-उधर ले जा सकें। चाय रखने के लिए ऊपर से टेबुल को धीरे धीरे नीचे किया जा सके ताकि हम मज़े में वहाँ से कप उठा चाय की चुस्कियाँ ले सकें।...."



इंटीरियर डेकोरेटर के चेहरे पर अब तक घबड़ाहट की रेखाएँ उभर आईं थीं पर किशोर कहते रहे...
"....
आप तो जानते ही हैं कि मैं एक प्रकृति प्रेमी हूँ, इसलिए अपने कमरे की दीवार की सजावट के लिए मैं चाहता हूँ कि उन पर पेंटिंग्स की बजाए लटकते हुए जीवित कौए हों और पंखे की जगह हवा छोड़ते बंदर... "


किशोर का कहना था कि ये सुनकर वो व्यक्ति बिल्कुल भयभीत हो गया और तेज कदमों से कमरे से बाहर निकला और फिर बाहर निकलकर एकदम से गेट की तरफ़, विद्युत इंजन से भी तेज रफ़्तार से दौड़ पड़ा।
ये बात किशोर दा ने प्रीतीश नंदी को १९८५ में दिए गए साक्षात्कार में बताई थी। प्रीतीश नंदी ने जब पूछा कि क्या ये उनका पागलपन नहीं था? तो किशोर का जवाब था कि अगर वो शख्स उस गर्म दुपहरी में वूलेन थ्री पीस पहनने का पागलपन कर सकता हे तो मैं अपने कमरे में जिंदा काँव-काँव करते कौओं को लटकाने का विचार क्यूँ नहीं ला सकता ?


आखिर क्या सोचते थे किशोर, अपने समकालीनों के बारे में ?
लड़कपन से ही किशोर के. एल. सहगल के दीवाने थे। बचपन मे वे अपनी पॉकेटमनी से सहगल साहब के रिकार्ड खरीदा करते थे। सही मायने में वो उनको अपना गुरु मानते थे।जब उन्होंने खुद बतौर गायक काफी ख्याति अर्जित कर ली तो एक संगीत कंपनी ने उनके सामने सहगल के गीतों को गाने का प्रस्ताव रखा। किशोर ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था
....
"
मैं उनके गीतों को और बेहतर गाने की कोशिश क्यूँ करूँ ? कृपया उन्हें हमारी यादों में बने रहने दें। उनके गाये गीत, उनके ही रहने दें। मुझे ये किसी एक शख्स से भी नहीं सुनना कि किशोर ने सहगल से भी अच्छा इस गीत को गाया। "


सहगल का विशाल छायाचित्र हमेशा उनके घर के पोर्टिको की शोभा बढ़ाता रहा। और उसी तसवीर के बगल में रफी साहब की तसवीर भी लगी रहती थी। किशोर, रफी की काबिलियत को समझते थे और उसका सम्मान करते थे। सत्तर के दशक में जब किशोर दा की तूती बोल रही थी, तो उनके एक प्रशंसक ने कह दिया....
"
किशोर दा , आपने तो रफी की छुट्टी कर दी।..."


उस व्यक्ति को प्रत्त्युत्तर एक चाँटे के रूप में मिला।किशोर और रफी के फैन आपस में एक दूसरे की कितनी खिंचाई कर लें, वास्तविक जिंदगी में कभी इन महान गायकों के बीच आपसी सद्भाव की दीवार नहीं टूटी।
किशोर और लता जी के युगल गीत काफी चर्चित रहे हैं। इतने सालों के बाद आज भी 'आँधी', 'घर', 'हीरा पन्ना', 'सिलसिला' और 'देवताजैसी फिल्मों के गीत को सुनने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है।



किशोर, लता को अपना सीनियर मानते थे और इसीलिए किसी गीत के लिए उन्हें जितना पैसा मिलता वो उससे एक रुपया कम लेते।
और लता जी, साथ शो करतीं तो तारीफ़ों के पुल बाँध देतीं। हमेशा किशोर को किशोर दा कह कर संबोधित करतीं। ये अलग बात थी कि उम्र में किशोर लता से मात्र एक महिना चौबीस दिन ही बड़े थे।


किशोर और आशा जी को पंचम की धुनों में सुनने का आनंद ही अलग है। अपने एक साक्षात्कार में आशा जी ने कहा था कि
"
किशोर एक जन्मजात गायक थे जो गाते समय आवाज़ में नित नई विविधता लाने में माहिर थे। इसीलिए उनके साथ युगल गीत गाने में मुझे और सजग होना पड़ता था, गायिकी में उनकी हरकतों को पकड़ने के लिए।"


किशोर दा भी मानते थे कि उनके चुलबुले अंदाज को कोई मिला सकता है तो वो थीं आशा। इसीलिए कहा करते

"She is my match at mike. "



किशोर कुमार की निजी जिंदगी
किशोर कुमार की पारिवारिक जिंदगी, उनकी शख्सियत जितनी ही पेचीदा रही।


बात १९५१ की है, उस वक्त किशोर मुंबई फिल्म उद्योग में एक अदाकार के तौर पर पाँव जमाने की कोशिश कर रहे थे। इसी साल उन्होंने रूमा गुहा ठाकुरता से शादी की। १९५२ में अमित कुमार जी की पैदाइश हुई। ये संबंध १९५८ तक चला। रूमा जी का अपना एक आकर्षक व्यक्तित्व था। एक बहुआयामी कलाकार के रूप में बंगाली कला जगत में उन्होंने बतौर अभिनेत्री, गायिका, नृत्यांगना और कोरियोग्राफर के रुप में अपनी पहचान बनाई। पर उनका अपने कैरियर के प्रति यही अनुराग किशोर को रास नहीं आया।


किशोर ने खुद कहा है कि
"...
वो एक बेहद गुणी कलाकार थीं। पर हमारा जिंदगी को देखने का नज़रिया अलग था। वो अपना कैरियर बनाना चाहती थीं और मैं उन्हें एक घर को बनाने वाली के रूप में देखना चाहता था। अब इन दोनों में मेल रख पाना तो बेहद कठिन है। कैरियर बनाना और घर चलाना दो अलग अलग कार्य हैं। इसीलि॓ए हम साथ नहीं रह पाए और अलग हो गए।..."

१९५८ में ये संबंध टूट गया। इससे पहले १९५६ में मधुबाला, किशोर की जिंदगी में चुकी थीं। पाँच साल बाद दोनों विवाह सूत्र में बँध तो गए पर किशोर दा के माता-पिता इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं पाए। बहुतेरे फिल्म समीक्षक इस विवाह को'Marriage of Convenience' बताते हैं। दिलीप कुमार से संबंध टूटने की वजह से मधुबाला एक भावनात्मक सहारे की तालाश में थीं और किशोर अपनी वित्तीय परेशानियों से निकलने का मार्ग ढ़ूंढ़ रहे थे।


पर इस रिश्ते में प्यार बिलकुल नहीं था ये कहना गलत होगा। गौर करने की बात है कि मधुबाला नेनर्गिस की सलाह ना मानते हुएभारत भूषण और प्रदीप के प्रस्तावों को ठुकरा कर किशोर दा से शादी की। तो दूसरी ओर किशोर ने ये जानते हु॓ए भी कि उनकी होने वाली पत्नी, एक लाइलाज रोग (हृदय में छेद) से ग्रसित हैं, उनसे निकाह रचाया। पर शुरुआती प्यार अगले सालों में मद्धम ही पड़ता गया।


किशोर ने Illustrated Weekly को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था... 


"...मैंने उन्हें अपनी आँखों के सामने मरते देखा। इतनी खूबसूरत महिला की ऍसी दर्दभरी मौत....! वो अपनी असहाय स्थिति को देख झल्लाती, बड़बड़ाती और चीखती थीं। कल्पना करें इतना क्रियाशील व्यक्तित्व रखने वाली महिला को नौ सालों तक चारदीवारी के अंदर एक पलंग पर अपनी जिंदगी बितानी पड़े तो उसे कैसा लगेगा? मैं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का अंतिम समय तक प्रयास करता रहा। मैं उनके साथ हँसता और उनके साथ रोता रहा। ..."
पर मधुबाला की जीवनी लिखने वाले फिल्म पत्रकार'मोहन दीप' अपनी पुस्तक में उनके इस विवाह से खास खुशी ना मिलने का जिक्र करते हैं। सच तो अब मधुबाला की डॉयरी के साथ उनकी कब्र में दफ़न हो गया, पर ये भी सच हे कि किशोर उनकी अंतिम यात्रा तक उनके साथ रहे और जिंदगी के अगले सात साल उन्होंने एकांतवास में काटे। अगर गौर करें तो उनके लोकप्रिय उदासी भरे नग्मे इसी काल खंड की उपज हैं। 


१९७६ में उन्होंने योगिता बाली से शादी की पर ये साथ कुछ महिनों का रहा। किशोर का इस असफल विवाह के बारे में कहना था....


"...
ये शादी एक मज़ाक था। वो इस शादी के प्रति ज़रा भी गंभीर नहीं थी। वो तो बस अपनी माँ के कहे पर चलती थी। अच्छा हुआ, हम जल्दी अलग हो गए।..."


वैसे योगिता कहा करती थीं कि किशोर ऍसे आदमी थे जो सारी रात जग कर नोट गिना करते थे। ये बात किशोर ने कभी नहीं मानी और जब योगिता बाली ने मिथुन से शादी की, किशोर ने मिथुन के लिए गाना छोड़ दिया। इस बात का अप्रत्यक्ष फ़ायदा बप्पी दा को मिला और मिथुन के कई गानों में उन्होंने अपनी आवाज़ दी।


१९८० में किशोर ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उनके बेटे अमित से मात्र दो वर्ष बड़ी थीं। पर किशोर, लीना के साथ सबसे ज्यादा खुश रहे। उनका कहना था..
'...
मैंने जब लीना से शादी की तब मैंने नहीं सोचा था कि मैं दुबारा पिता बनूँगा। आखिर मेरी उम्र उस वक़्त पचास से ज्यादा थी। पर सुमित का आना मेरे लिए खुशियों का सबब बन गया। मैंने हमेशा से एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था। लीना ने वो सपना पूरा किया।
...
...
वो एक अलग तरह की इंसान है उसने दुख देखा है..आखिर अपने पति की आँख के सामने हत्या हो जाना कम दुख की बात नहीं है। वो जीवन के मूल्य और छोटी-छोटी खुशियों को समझती है। इसीलिए उसके साथ मैं बेहद खुश हूँ। ..."


किशोर को मुंबई की फिल्मी दुनिया और उसके लोग कभी रास नहीं आए। १९८५ में संन्यास का मन बना चुकने के बाद उन्होंने कहा था...
"......
कौन रह सकता है इस चालबाज, मित्रविहीन दुनिया में, जहाँ हर पल लोग आपका दोहन करने में लगे हों। क्या यहाँ किसी पर विश्वास किया जा सकता है? क्या कोई भरोसे का दोस्त मिल सकता है यहाँ? मैं इस बेकार की प्रतिस्पर्धा से निकलना चाहता हूँ। कम से कम अपने पुरखों की ज़मीन खंडवा में तो वैसे ही जी सकूँगा जैसा मैं हमेशा चाहता था। कौन इस गंदे शहर में मरना चाहेगा ?......."


दरअसल इस कथन का मर्म जानने के लिए फिर थोड़ा पीछे जाना होगा। किशोर की ये कड़वाहट उनके फिल्म जगत में बिताए शुरु के दिनों की देन है। वे कभी अभिनेता नहीं बनना चाहते थे। चाहते थे तो सिर्फ गाना पर बड़े भाई दादा मुनि का कहना टाल भी नहीं पाए। अभिनय में गए तो सफलता भी हाथ लगी पर गायक के रूप में ज्यादातर संगीत निर्देशकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। खुद किशोर ने अपनी लाचारी और अपने अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में ये सफाई पेश की है...
"...
मैं सिर्फ गाना चाहता था। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि मुझे अभिनय की दुनिया में आना पड़ा। मुझे अभिनय में बिताया अपना का हर एक पल नागवार गुजरा। मैंने कौन-कौन से तरीके नहीं अपनाए इस दुनिया से पीछा छुड़ाने के लिए...अपने संवाद की पंक्तियाँ गलत बोलीं, पागलपन का नाटक किया, बाल मुंडवाए, गंभीर दृश्यों के बीच यूडलिंग शुरु कर दी। मीना कुमारी के सामने वो संवाद बोले, जो किसी दूसरी फिल्म में बीना रॉय को बोलने थे..........पर फिर भी उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा और आखिरकार एक सफल नायक बना ही दिया।...."


किशोर ने यहाँ कोई अतिश्योक्ति नहीं की थी। उनके अज़ीबोगरीब हरकतों के कुछ किस्से तो पहले भी लिखे जा चुके हैं, अब कुछ की बानगी और लें...
भाई-भाई की शूट में निर्देशक रमन के द्वारा अपने ५००० रुपए देने के लिए अड़ गए। अशोक कुमार के समझाने पर अनिच्छा पूर्वक वो दृश्य करने को तैयार हुए। छोटे से शाँट में उन्हें सिर्फ बड़बड़ाना था और थोड़ी चहलकदमी करनी थी।

तो किशोर ने क्या किया, कुछ दूर चलते ..कलाबाजी खाते और जोर से कहते पाँच हजार रुपया। ऐसी कलाबाजियाँ खाते-खाते वो कमरे के दूसरी तरफ पहुँचे जहाँ एक पहिया गाड़ी खड़ी थी. किशोर उस पर होते हुए सीधे बाहर पहुँचे और एक छलाँग मार कर अपनी गाड़ी पर सवार होकर चलते बने  बाद में रमन ने स्वीकार किया कि वो किशोर को पैसा चुका पाने की हालत में नहीं थे।


एक निर्माता को तो उन्होंने इतना परेशान किया कि वो उनके खिलाफ़ कोर्ट से सम्मन ले आए कि किशोर उनके आदेशानुसार ही काम करेंगे। 
नतीजा ये हुआ कि सेट पर अपनी कार से उतरने के पहले भी वो निर्माता का आदेश मिलने के बाद ही उतरते। एक बार वो शूटिंग के दौरान गाड़ी को लेते हुए खंडाला चले गए, तुर्रा ये कि डॉयरेक्टर ने शॉट के बाद 'कट' नहीं बोला तो मैं क्या करता...


पर ये सब उन्होंने सिर्फ फिल्मी दुनिया से निकलने के लिए किया ऐसा भी नहीं था। कुछ बचपना कह लें और कुछ उनके खुराफाती दिमाग का फ़ितूर, अपनी निजी जिंदगी में उन्होंने अपनी इमेज को ऍसा ही बनाए रखा।
उनसे जुड़ी कहानियाँ खत्म होने का नाम नहीं लेतीं। शयनकक्ष में खोपड़ी की आँखों से निकलती लाल रोशनी, ड्राइंग रूम में उल्टी पड़ी कुर्सियाँ, मेहमानों पर उनके इशारों पर भौंकते कुत्ते, गौरीकुंज के अपने आवास के बाहर लगा बोर्ड

“Beware of Kishore Kumar !


उनके मिज़ाज की गवाही देता है।
पर इतना सब जानते हुए भी उनके करीबी उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। साथी कलाकारमहमूद का कहना था

"....
वो ना तो सनकी थे ना ही कंजूस, जैसा कि कई लोग सोचते हैं। वास्तव में वो एक जीनियस थे। वो राज कपूर के बड़बोले रुप थे, एक हरफनमौला जिसे सिनेमा के हर पहलू की जानकारी थी और जिसे हो हल्ला मचाकर लोगों की नज़रों में बने रहने का शौक था।....."


वहीं अभिनेत्री तनुजा का मानना था
"......
मुझे समझ नहीं आता कि वो पागलपन का मुखौटा क्यूँ लगाए रहते थे?
शायद, एक आम इंसान की तरह वो दुनिया से अपने अक़्स का कुछ हिस्सा छुपाना चाहते थे। जब वो अच्छे मूड में रहते तो अपने चुटकुलों से हँसा-हँसा कर लोट पोट कर देते थे। ...."


संगीत निर्देशक कल्याण का कहना था
"....
किशोर मूडी इंसान थे, पर मैं समझता हूँ कि किसी कलाकार को ये छूट तो आपको देनी ही होगी। उनसे कुछ करवाने के लिए मुझे बच्चों जैसा व्यवहार करना पड़ता था। सो मैं जो उनसे चाहता ठीक उसका उलटा बोलता।...."


मि. इडिया मे अलिशा चिनाय के साथ गाया गाना " काटे नही कटते" इनका आखिरी हिन्दी आफिशिअल गाना था...


१९८७ में हृदयगति रुक जाने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। 

शानदार गायकी और शानदार अभिनय के मलिक इस महान विभूति के बारे में कितना भी लिखूँ अपूर्ण रहेगा बस इन्हे सुनते  हुए मन एक दूसरी दुनिया में चला जाता है जहाँ अपने आप को अभिव्यक्त करने की इच्छा बलवती हो जाती है