Monday, 17 August 2015

सरकारी स्कूलों में बच्चे क्यों नहीं पढ़ाते सरकारी कर्मचारी?

सरकारी यानी घटिया!



चलिए शुरूआत करते हैं एक सच्ची कहानी से:



तमिलनाडु के एक पिछड़े ज़िले इरोड के ज़िलाधीश यानी कलेक्टर  ने अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में भर्ती करवाया है. जब वे इस स्कूल में अपनी बच्ची के दाखिले के लिए पहुँचे तो दूसरे माँ-बाप की तरह कतार में खड़े हुए.



दिल्ली के एक अख़बार में इस ख़बर का प्रकाशित होना ही साबित करता है कि यह कुछ असामान्य सी बात है. यक़ीनन ज़िलाधीश को उनके साथी अधिकारियों ने समझाया भी होगा. लेकिन वे नहीं माने. उन्होंने अख़बार से भी बात करने से इनकार कर दिया कि ये उनका निजी फ़ैसला है.किसी अफ़सर की बेटी सरकारी स्कूल में, आम लोगों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकती है?



वहाँ किसानों और मज़दूरों के बच्चे पढ़ते हैं, उस सर्वहारा वर्ग के बच्चे जिनके लिए दो जून की रोटी के बाद इतना पैसा बचता ही नहीं कि वे सरकारी स्कूल के अलावा कहीं और अपने बच्चे को पढ़ा सकें.



अब सरकारी स्कूल में किसी अफ़सर, नेता, व्यापारी, उद्योगपति, डॉक्टर और ऐसे ही किसी ऐसे व्यक्ति के बच्चे नहीं पढ़ते जो उच्च या मध्यवर्ग में आते हैं. जो महंगे निजी स्कूल में नहीं जा सकते वो किसी सस्ते निजी स्कूल में जाते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में नहीं जाते.



ठीक वैसे ही जैसे इस वर्ग के लोग और उनके रिश्तेदार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए नहीं जाते. एम्स और पीजीआई जैसे कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन वहाँ भी वो तब जाते हैं जब जेब जवाब दे जाती है या और कोई चारा नहीं होता.



वो सरकारी बसों में नहीं चढ़ते, सरकारी डाक व्यवस्था के इस्तेमाल को भरसक टालते हैं. वो सरकारी कंपनियों के उत्पाद नहीं ख़रीदते यहाँ तक कि टेलीफ़ोन जैसी सुविधा में भी निजी कंपनी को तरजीह देते हैं.



सरकारी के नाम पर वे रेल और सड़क जैसी गिनी चुनी चीज़ों का ही इस्तेमाल करते हैं. वो भी इसलिए कि उसका विकल्प नहीं है.



एक प्रोफ़ेसर का आकलन है कि संपन्न वर्ग को तो छोड़ दीजिए अब मध्यवर्ग के लोग भी हर उस सुविधा के इस्तेमाल को अपनी तौहीन समझते हैं जो सरकारी है.



हालात इतने ख़राब हैं कि यदि कोई व्यक्ति पैसा खर्च करने में ज़रा सा भी सक्षम है तो वह सरकारी कंडोम पर भी भरोसा नहीं करता.



वैसे तो ये सरकार के लिए चिंता की बात होनी चाहिए लेकिन सरकार को चलाने वाले राजनेता और अधिकारी दोनों को इसकी चिंता नहीं दिखती.



न्यायालयों को इस बात पर चिंता ज़ाहिर करते नहीं देखा कि सरकारी स्कूल इतने बदहाल क्यों है कि हर कोई अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतराता है. भेजता वही है जिसके पास विकल्प नहीं है या दोपहर को मिलने वाले उस भोजन की चिंता है जो न्यायालय के कहने पर सरकारी स्कूलों में बाँटा जा रहा है.



आज से दो दशक पहले स्थिति इतनी ख़राब नहीं थी. यक़ीन न हो तो उन राजनेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों से बात करके देखिए जो आज से बीस साल पहले किसी छोटे शहर के प्रायमरी स्कूल में पढ़ते थे. उनमें से अधिकांश आपको किसी न किसी सरकारी स्कूल में पढ़े हुए मिल जाएँगे. उनका जन्म किसी न किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होगा.



लेकिन आज क्या वे अपने बच्चों का जन्म किसी सरकारी अस्पताल में होने की कल्पना कर सकते हैं? क्या वे अपने बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजेंगे?



ये आज़ादी के बाद के पाँचवें और छठवें दशक में सरकारी व्यवस्था में हुए पतन का सबूत है. ये सरकारी प्रश्रय में निजी व्यवसाय के पनपने का सबूत भी है. ये नेहरू के समाजवादी भारत का मनमोहन सिंह के पूंजीवादी भारत में तब्दील हो जाने का सच है.



हमने अपनी आँखों से देखा है कि सरकारी अमला किस तरह से एक सरकारी व्यवस्था को धीरे-धीरे इसलिए ख़राब करता है ताकि उसके बरक्स निजी बेहतर दिखने लगे और आख़िर सरकारी व्यवस्था दम तोड़ दे या फिर उसका निजीकरण किया जा सके.



तमिलनाडु के ज़िलाधीश की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरु कर दी है. पक्का है कि अगर ज़िलाधीश की बच्ची वहाँ दो चार साल पढ़ पाई तो उसका नक्शा और स्तर सब बदल जाएगा.



लेकिन यह एक अपवाद भर है.



परिस्थितियाँ तो उस दिन बदलेंगीं जिस दिन हर राजनेता और अधिकारी अपने बच्चों को ऐसे ही सरकारी स्कूलों में भेजने का फ़ैसला कर ले.



यह समय है जब हम भ्रष्टाचार जैसी व्यापक समस्या के बारे में बात करते हुए ये भी सोचें कि जो कुछ भी सरकारी है वह धीरे-धीरे निकृष्ट क्यों होता जा रहा है और सिवाय सरकारी नौकरी के.



हम सब चुप क्यों हैं?

सरकारी स्कूलों के स्तर गिरने की एक वजह यह है कि मध्यवर्ग ने उससे मुंह मोड़ लिया है. मगर इसका एक छिपा हुआ पहलू भी है. आज सरकारी स्कूलों में ज़्यादातर आदिवासी, दलितों और अन्य पिछड़े व ग़रीब तबके के बच्चे दिखाई देते हैं. ये बच्चे तब कहां थे जब इन स्कूलों में आज़ादी के बाद उभरे पहले मध्यवर्ग के बच्चे पढ़ रहे थे? और अब जब उनके पढ़ने की बारी आई तो सरकारी स्कूलों का स्तर गिर गया या गिरा दिया गया!



सरकारी मतलब घोटाला, ग़ैर ज़िम्मेदारी, कोई जवाबदेही नहीं. इसलिए लोग डरते हैं सरकारी सुविधाओं से. मगर सरकारी नौकरी मतलब यही फ़ायदे. इसलिए लोग सरकारी नौकरी चाहते हैं. स्वामी रामदेव और अन्ना जैसे लोग घोटाले रोकने और जवाबदेही के लिए क़ानून की बात करते हैं तो वह अलोकतांत्रिक है. वाह रे सरकारी सुविधाएँ और सरकारी लोकतंत्र..



जब ब्रिटेन की महारानी ने भारत की आज़ादी की घोषणा की उससे पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने उनसे कहा था कि वे ऐसा न करें. उनका कहना था कि अगर भारत को आज़ाद किया जाएगा तो इसका मतलब है सत्ता चोर और लूटेरों के हाथों में सौंपना. आज लगता है कि चर्चिल की सलाह 101 प्रतिशत सही थी।



खैर मुझे इन सबसे क्या मैं एक जागरूक भारतीय हूँ, देशभक्त हूँ, खुद सरकारी विद्यालय में पढ़ा हूँ, पर मेरा बच्चा तो कांनवेंट में ही पढ़ेगा जी और हाँ वो डाँस कम्पटिशन में हिस्सा लेगा, गाया गाएगा, क्रिकेट खेलेगा, IIT or IIM मे जाएगा, विदेश घुमेगा, सरकारी नौकरी करेगा तो बड़ी कमाई वाली और हाँ जी देखो आर्मी और साधारण और ईमानदार पोलिस की बात मत करना उसमें कमाई कहाँ?



देशभक्ति के लिए औरों के लड़के बच्चे हैं मैने तो इतना कमा लिया है जी की सुख चैन से रहे।चलो चलते हैं भैया कहाँ बेकार की बातों में खींच लिया, इससे देश का कुछ नही होने वाला।

Bye take care!!

Get well soon INDIA..

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