Sunday, 27 September 2015

72 हूरें

उस दिन जब मौलवी जी की मौत हुई थी, तब सबने कहा था- मौलवी साहब को जन्नत नसीब हुई।


पर अभी मुझे मालूम हुआ कि साहब, जन्नत नही दोजख(नरक) मे हैं और ७२ हूरें नही शैतान की कढ़ाई नसीब हुई है। मैं कहूं तो किसी को इस पर भरोसा नहीं होगा, पर यह सही है कि उन्हें दोजख में डाल दिया गया है और उन पर ऐसे जघन्य पापों के आरोप लगाये गये हैं कि निकट भविष्य में उनके दोजख से छूटने की कोई आशा नहीं है। अब हम उनकी आत्मा की शान्ति की प्रार्थना करें तो भी कुछ नहीं होगा। बड़ी से बड़ी शोक-सभा भी उन्हें नरक से नहीं निकाल सकती।


सारा मुहल्ला अभी तक याद करता है कि मौलवी साहब सुबह से अजान में लाउड-स्पीकर लगाते थे और दिन में ५ बार और उस पर अपनी मंडली समेत ज्ञान बाँटा करते। जुम्मे और खास दिन तो चौबीसों घंटे लाउड-स्पीकर पर अखण्ड कलमे पढ़े जाते।

एक-दो बार मुहल्ले वालों ने इस अखण्ड कोलाहल का विरोध किया तो मौलवीजी ने अनुयायी की भीड़ जमा कर ली और दंगा कराने पर उतारू हो गए, कहने लगे तुम इस्लाम का विरोध कर रहे हो दोजख जाओगे, वे मस्जिद के लाउड-स्पीकर पर प्राण देने और प्राण लेने पर तुल गये थे।


ऐसे, जिन्होंने अरबों बार अल्हा-हू-अकबर का नाम लिया, नरक में भेजे गए और अजामिल, जिसने एक बार भूल से अकबर का नाम लेकर एक मजबूर की मदद की, अभी भी जन्नत के मजे लूट रहा है। अंधेर कहां नहीं है!


मौलवी जी बड़े विश्वास से उस लोक में पहुंचे। बड़ी देर तक यहां-वहां घूमकर देखते रहे। फिर एक फाटक पर पहुंचकर चौकीदार से पूछा- जन्नत प्रवेश-द्वार यही है न?


चौकीदार ने कहा- हां यही है।


वे आगे बढ़ने लगे, तो चौकीदार ने रोका- प्रवेश-पत्र यानी टिकिट दिखाइए पहले।


मौलवी साहब को क्रोध आ गया। बोले- मुझे भी टिकिट लगेगा यहां? मैंने कभी टिकिट नहीं लिया। सिनेमा मैं बिना टिकिट देखता था और रेल में भी बिना टिकिट बैठता था। कोई मुझसे टिकिट नहीं मांगता। अब यहां जन्नत में टिकिट मांगते हो? मुझे जानते हो। मैं मौलवी हूं।


चौकीदार ने शान्ति से कहा- होंगे। पर मैं बिना टिकिट के नहीं जाने दूंगा। आप पहले उस दफ्तर में जाइए। वहां आपके काडों हिसाब होगा और तब आपको टिकिट मिलेगा।


मौलवी साहब उसे ठेलकर आगे बढ़ने लगे। तभी चौकीदार एकदम पहाड़ सरीखा हो गया और उसने उन्हें उठाकर दफ्तर की सीढ़ी पर खड़ा कर दिया।


 मौलवी साहब दफ्तर में पहुंचे। वहां कोई बड़ा पैगम्बर फाइलें लिए बैठा था।

मौलवी साहब ने अदब से झुककर कहा- अहा मैं पहचान गया मोहसिन साहब बैठे हैं।


फाइल से सिर उठाकर उसने कहा- मैं मोहसिन नही हूं। झूठी चापलूसी मत करो। जीवन-भर वहां तो कुकर्म करते रहे हो और यहां आकर ‘हें-हें’ करते हो। नाम बताओ।


मौलवी साहब ने नाम बताया, मस्जिद का पता बताया।


उस अधिकारी ने कहा- तुम्हारा मामला बड़ा पेचीदा है। हम अभीतक तय नहीं कर पाये कि तुम्हे हूरें दे या नरक का शैतान। तुम्हारा फैसला खुद अल्हा करेंगे।


मौलवी साहब ने कहा- मेरा मामला तो बिल्कुल सीधा है। मैं सोलह आने अल्हा का बंदा हूं। नियम से ५ वक्त की नमाज करता रहा हूं। कभी झूठ नहीं बोला और कभी चोरी नहीं की। मस्जिद मे कभी औरतों को आने नही दिया, औरत नरक का द्वार है। मैंने कभी कोई पाप नहीं किया। मुझे तो आंख मूंदकर आप जन्नत भेज सकते हैं।


अधिकारी ने कहा- मौलवी साहब आपका मामला उतना सीधा नहीं है, जितना आप समझ रहे हैं। अल्हा खुद उसमें दिलचस्पी ले रहे हैं। आपको मैं उनके सामने हाजिर किये देता हूं।


एक चपरासी मौलवी को अल्हा के दरबार में ले चला। मौलवी साहब ने रास्ते में ही कलमा.चालू कर दिया। जब वे अल्हा के सामने पहुंचे तो बड़े जोर-जोर से अजान पढ़ने लगे:-

‘अल्हा-हू-अकबर '


नमाज पूरा करके कड़क आवाज में बोले- अहा, दुनिया की ख्वाहिश आज पूरी हुई है।

अल्हा नमाज ‘बोर’ हो रहे थे। रुखाई से बोले- अच्छा अच्छा ठीक है। अब क्या चाहते हो, सो बोलो।

मौलवी साहब गिड़गिडाए- अकबर, आपसे क्या छिपा है! आप तो सबकी इच्छा जानते हैं। कहा है- मोहसिन, मुझे हूरों के बीच कोई अच्छी सी जगह दिला दीजिए।



अल्हा ने कहा- तुमने ऐसा क्या किया है, जो तुम्हें जन्नत मिले ?



मौलवी साहब को इस प्रश्न से चोट लगी। जिसके लिए इतना किया, वही पूछता है कि तुमने ऐसा क्या किया! अल्हा पर क्रोध करने से क्या फायदा- यह सोचकर गुस्सा पी गये। दीनभव से बोले- मैं रोज नमाज करता रहा।



अल्हा ने पूछा- लेकिन लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे?



सहज भव से बोले- उधर सभी लाउड-स्पीकर लगाते हैं। सिनेमावाले, मिठाईवाले, काजल बेचने वाले- सभी उसका उपयोग करते हैं, तो मैंने भी कर लिया।



अल्हा ने कहा- वे तो अपनी चीज का विज्ञापन करते हैं। तुम क्या मेरा विज्ञापन करते थे? मैं क्या कोई बिकाऊ माल हूं।



मौलवी साहब सन्न रह गये। सोचा, अल्हा होकर कैसी बातें करते हैं।



अल्हा ने पूछा- मुझे तुम अन्तर्यामी मानते हो न?



जी हां!



अल्हा ने कहा- फिर अन्तर्यामी को सुनाने के लिए लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे? क्या मैं बहरा हूं? यहां सब पैगम्बर मेरी हंसी उड़ाते हैं। मेरी पत्नी मजाक करती है कि यह तुम्हें बहरा समझता है।



मौलवी साहब जवाब नहीं दे सके।



अल्हा को और गुस्सा आया। वे कहने लगे- तुमने कई साल तक सारे मुहल्ले के लोगों को तंग किया। तुम्हारे कोलाहल के मारे वे न काम कर सकते थे, न चैन से बैठ सकते थे और न सो सकते थे। उनमें से आधे तो मुझसे घृणा करने लगे हैं। सोचते हैं, अगर अल्हा न होता तो यह इतना हल्ला न मचाता। तुमने मुझे कितना बदनाम किया है!



मौलवी साहब ने साहस बटोरकर कहा- आपका नाम लोंगों के कानों में जाता था, यह तो उनके लिए अच्छा ही था। उन्हें अनायास जन्नत मिल जाता था।



अल्हा को मूर्खता पर तरस आया। बोले- पता नहीं यह परंपरा कैसे चली कि मौलवी का मूर्ख होना जरूरी है। और किसने तुमसे कहा कि मैं चापलूसी पसंद करता हूं? तुम क्या यह समझते हो कि तुम मेरी  कोलाहल करोगे तो मैं किसी बेवकूफ अफसर की तरह खुश हो जाऊंगा?


मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं कि तुम जैसे मूर्ख मुझे चला लें। मैं चापलूसी से खुश नहीं होता कर्म देखता हूं।



मौलवी ने कहा- मैंने कभी कोई कुकर्म नहीं किया।



अल्हा हंसे। कहने लगे- तुमने आदमियों की हत्या की है। उधर की अदालत से बच गये, पर यहां नहीं बच सकते।



धीरज अब छूट गया। वे अपने अल्हा की नीयत के बारे में शंकालु हो उठे। सोचने लगे, यह अल्हा होकर झूठ बोलता है। जरा तैश में कहा- आपको झूठ बोलना शोभा नहीं देता। मैंने किसी आदमी की जान नहीं ली। अभी तक मैं सहता गया, पर इस झूठे आरोप को मैं सहन नहीं कर सकता। आप सिद्ध करिए कि मैंने हत्या की।



अल्हा ने कहा- मैं फिर कहता हूं कि तुम हत्यारे हो, अभी प्रमाण देता हूं।

अल्हा ने एक अधेड़ उम्र के आदमी को बुलाया। मौलवी से पूछा- इसे पहचानते हो?



हां, यह मेरे मुहल्ले का रमानाथ मास्टर है। पिछले साल बीमारी से मरा था।– मौलवी ने विश्वास से कहा।



अल्हा बोले- बीमारी से नहीं, तुम्हारे लाउड-स्पीकर  से मरा है। तुम्हारे  अजान से मरा है। रमानाथ, तुम्हारी मृत्यु क्यों हुई?



रमानाथ ने कहा- प्रभु मैं बीमार था। डॉक्टर ने कहा कि तुम्हें पूरी तरह नींद और आराम मिलना चाहिए। पर  मौलवी के लाउडस्पीकर पर  मौलवी के मारे मैं सो न सका, न आराम कर सका। दूसने दिन मेरी हालत बिगड़ गयी और चौथे दिन मैं मर गया।



मौलवी सुनकर घबरा उठे।



तभी एक बीस-इक्कीस साल का लड़का बुलाया गया। उससे पूछा- सुरेंद्र,तुम कैसे मरे?



मैंने आत्महत्या कर ली थी- उसने जवाब दिया।



आत्महत्या क्यों कर ली थी?-



सुरेंद्रनाथ ने कहा- मैं परीक्षा में फेल हो गया था।

परीक्षा में फेल क्यों हो गये थे?



मौलवी के लाउड-स्पीकर के कारण मैं पढ़ नहीं सका। मेरा घर मस्जिद के पास ही है न!



याद आया कि इस लड़के ने उनसे प्रार्थना की थी कि कम से कम परीक्षा के दिनों में लाउड-स्पीकर मत लगाइए।



अल्हा ने कठोरता से कहा- तुम्हाने पापों को देखते हुए मैं तुम्हें नरक में डाल देने का आदेश देता हूं।



मौलवी ने भागने की कोशिश की, पर नरक के डरावने दूतों ने उन्हें पकड़ लिया।


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