Monday, 29 June 2015
Thursday, 25 June 2015
फुन्नी दादा की प्रेम कहानी
फुन्नी दादा की प्रेम कहानी वाया शिलाजीत और मोबाइल
त्रिपाठी परिवार के पुरुष जन्मजात दादा होते हैं। जमींदारी चली गयी, साथ में दादागीरी भी। ऐसे में समझदार पुरखों ने सरनेम ही दादा लिखना शुरू कर दिया और परिवार की मौखिक शान कायम रखी। इसी दादा वंश की तीसरी पीढ़ी के सिपहसालार हैं- फुन्नी दादा। फुन्नी दादा यूँ तो हैं पचास के आस पास पर पच्चीस के दिखने के लिए खासी मशक्कत करते हैं। ऐसी मशक्कत जिसे देख महिलाएं भी गश खा जाएँ। सिंगल पसली के मालिक हैं, सुबह उठकर मुगदर भांजते हैं। जमाने को दिखाने के लिए। पड़ोसी इस राज को आज तक नहीं जान पाए हैं कि मुगदर थर्माकोल का बना हुआ है। फुन्नी दादा की खोपड़ी मरुस्थल बन चुकी है। पर लोगों को फसल होने का भ्रम होता रहे इस लिए समूची खोपड़ी में डाई लगाते हैं। और ऊपर से काली टोपी पहन लेते हैं। फुन्नी दादा निपट कुंवारे हैं। सारे बाल मिट गए पर मुई शादी की चाहत न मिटी। फुन्नी दादा को इस स्थिति तक पहुँचाने के पीछे का कारण थे उनके पिता मन्नी दादा। जिन्होंने सरकार की परिवार नियोजन योजना को धता बताते हुए आठ बच्चे पैदा किये थे। जिनमें सात लड़कियां थीं। फुन्नी दादा ऊपर से पहले नंबर पर थे। बाप की गलती का खामियाजा बेटे ने भुगता था। फुन्नी दादा के मन में अपने पिता के प्रति खासी खुन्नस थी। फुन्नी दादा कहते थे –‘मेरा बाप संतोषी नहीं था। मेरे बाद एक और लाल की लालसा ने सात ललियाँ पैदा कर डालीं। पांच बीघे प्रति शादी के हिसाब से पैंतीस बीघे ज़मीन बेच डाली पर एक लड़के को न बेच पाए। पांच महीने हुए सबसे छोटी बहन की शादी किये हुए। खुद के घर में पानी टपकता है पर वाटर प्रूफ टेंट लगवा दिया। लालटेन जलाने को घर में तेल के लाले पड़े रहते हैं पर सड़क से लेकर घर और घर से लेकर जनवास तक छियासी ट्यूब लाइटें लगवा मारी थीं। कोटे से मिट्टी का तेल लाकर ढिबरी जलाने वाले मन्नी दादा ने पैंतीस हज़ार का लाईट हाउस बुक किया था। उन्होंने बेटियों को दहेज़ देने में कोई कोर कसर नहीं छोडी थी। उनका मानना था कि बेटी को दहेज़ के साथ विदा करने से वह सशक्त बनती है। बेटी की ससुराल में कन्या पक्ष का प्रभुत्व स्थापित होता है। वह समधियाने में सोफे पर पैर फैला कर बैठ सकते थे। मूंछो पर ताव दे सकते थे। आधी से ज्यादा ज़मीन दहेज़ के भेंट चढ़ गयी थी। मन्नी दादा को इस बात का कतई अफ़सोस न था। फुन्नी के अन्दर उनको बीस बीघे दिखाई पड़ते थे। हालांकि पहले तीस दिखाई पड़ते थे। लेकिन बेटे की बढ़ती उम्र के साथ बीघे घटते गए। अब इतना दाम भला कौन लगाएगा बेटे का।
हाँ तो बात फुन्नी दादा की चल रही थी। वह अंदर ही अन्दर पिता के कुपित रहते थे। पर बाहर जाहिर नहीं होने देते थे। उनकी शादी को लेकर गाँव में चुहलबाजी होती ही रहती थी। गाँव की भौजाइयां, चाचियों आदि पर इम्प्रेशन झाड़ने के लिए उन्होंने एक एल्बम बना रखा था जिसमें कई खूबसूरत लड़कियों के फोटो लगे होते थे। जो साड़ी के स्टीकर, पत्रिकाओं व ग्रीटिंग कार्ड्स से संकलित होती थीं। जैसे जैसे बहनों की शादियाँ निपटती गयीं वैसे वैसे इस फोटो संकलन के पन्ने भी बढ़ते गए। वह एल्बम दिखाते हुए गर्व से कहते थे ‘इतनी सारे प्रस्ताव आ चुके हैं पर मुझे ये लड़कियां पसंद नहीं आयीं, कारण यह है हम आतंरिक सुन्दरता चाहते हैं, भौतिक सौन्दर्य दिखावा मात्र है’। प्रेम के इस अद्भुत आध्यात्म को गाँव के खिल्लबाज अपने ही अंदाज में सेलिब्रेट करते थे। आतंरिक सौन्दर्य को लेकर कई नान वेज जुमले अगल बगल के गावों के ब्रिलियंट चुहलबाजों ने तैयार कर डाले थे।
फुन्नी दादा कहते थे इन चुहलबाजों से ‘उड़ा लो आज खिल्ली, एक दिन ऐसी खूबसूरत बेगम लाऊंगा कि खीसें थम जायेंगी तुम लोगों की। एक चुहलबाज बोला –‘हाय, काश कि सासें थम जातीं। ’फुन्नी दादा गुस्से में आये तो यह बोलता हुआ भाग गया कि सासें तो थमेंगी आपकी, । थाम नहीं पाओगे दादा इस उम्र में। इतना लबर लबर ठीक नहीं। ऐसी उम्र है दादा कि कहीं जोर की उल्टी हो जाय उल्टी के रास्ते दिल बाहर आ जायेगा। ’
ऐसे कमेन्ट सुनकर फुन्नी दादा अपने मित्र कमलू साहू की दुकान पर शिलाजीत चाट चाट कर बाप को गरियाते थे। कमलू साहू आल राउंडर किस्म का बनिया था। उसने एक कमरे में पूरा शोपिंग माल सजा रखा था। गेहूं, गुड़, चीनी, चायपत्ती, पीसीओ, मोबाइल, रीचार्ज, कपड़े से लेकर मेडिकल स्टोर तक सब मौजूद था उसकी दूकान में। कमलू साहू पल्लेदारी का काम भी करता था। फसल कटते ही फुन्नी दादा के घर पर बोरा लेकर पहुँच जाता था, और औने-पौने दाम पर अनाज खरीद लाता था। बदले में वह फुन्नी दादा को शिलाजीत खिलाता था। फुन्नी दादा को यह बिलकुल भी नहीं मालूम था कि मन्नी दादा भी उसके शिलाजीत क्लाइंट थे। चतुर सुजान कमलू गुप्त रूप से एक साथ दो पीढ़ियों को जवान बनाए रखने का पुनीत कार्य कर रहा था। युवा भारत निर्माण ऐसे ही होता है। शिलाजीत खिलाने के बाद कमलू फुन्नी दादा के फड़कते बाजुओं को पकड़कर बोला-‘शांत हो जाओ गुरु, आप भी इन चिरकुटों की बातों से तैश में आ जाते हैं। ये लो आज का अखबार कुछ नए रिश्तों का विज्ञापन आया हुआ है। ’ फुन्नी दादा अखबार के ‘वर चाहिए’ विज्ञापनों से नंबर नोट करने लगे। और फिर हमेशा की तरह कमलू साहू के पीसीओ से विज्ञापन पर दिए गए नंबरों पर फोन घुमाने लगे। वह खुद के बड़े भाई बनकर फोन करते थे, और एक सांस में सारी खूबियाँ बता डालते थे। ’लड़का अति सुन्दर है, एमए फर्स्ट इयर सेकण्ड क्लास से पास है, परिवार संभ्रांत है, सारी बहनें सेटल हैं, कोई नशा पत्ती नहीं करता है, अत्यंत व्यवहार कुशल है, आस पास में बहुत नाम है आदि आदि। कन्या पक्ष वाला पूछता कि सेलरी क्या पांच अंकों में है?इस बात पर वह खीझ जाते थे-‘अनलिमिटेड है डेढ़ बीघे में जितना गेहूं पैदा कर ले उतनी कमाई’। फुन्नी दादा ‘जाति बंधन नहीं’ से लेकर ‘तकालशुदा महिला तीन बच्चों के साथ अकेली है, आवश्यकता है एक जिम्मेवार पति और पिता की’ जैसे विज्ञापनों के नंबर भी मिलाते थे पर बात कमाई पर आकर अटक जाती थी। आज फिर वही हुआ पचास रुपये पी सीओ में स्वाहा हो गए पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। फुन्नी दादा ने बीड़ी सुलगाई और बोले –‘यार कमलू, आज कल हर कोई डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिकारी चाहता है, कोइ अच्छा इंसान चाहता ही नहीं’। कैसा लोकतंत्र है ये हम जैसों का क्या होगा ?’
‘गुरु, चिंता न करें देर आयेगी, दुरुस्त आएगी, आपको धैर्य रखना पड़ेगा,
‘यार कमलू, आज पचास रुपये हैं नहीं जेब में’
‘क्या बात करते हैं गुरु, कल पांच किलो गेहूं भिजवा दीजियेगा। ’
सप्ताह में हर रविवार जब अखबार में मैट्रीमोनियल आता था तो फुन्नी दादा की यही स्थिति होती थी। फुन्नी दादा के मन में हमेशा यह कसक रहती थी कि अखबार में दिए नंबर को लड़की का बाप ही क्यों उठाता है ?
आज की शाम फुन्नी दादा की ज़िंदगी में बहार बन कर आयी। उनकी नस नस में शिलाजीत दौड़ने लगा था। उनके पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे यही कारण था कि कमलू साहू के पीसीओ तक पहुँचने में उनको महज सेकंडों का समय लगा। मन्नी दादा उनकी स्पीड देख कर चिल्ला उठे, ’संभल कर बच्चा, इतना तेज हल चलाता तो पैदावार बढ़ जाती फसल की। ’बात कुछ यूँ थी कि आज शाम कमलू के पीसीओ पर किसी सुनीता का फोन आया था कानपुर से। वह फुन्नी दादा को पूछ रही थी। उसने आधे घंटे के बाद दोबारा फोन करने के लिए बोला था। फुन्नी दादा कमलू के साथ साँसें थाम कर फोन की घंटी की प्रतीक्षा करने लगे। उनका मन बावरा हो रहा था। धड़कनें धौंकनी बन चुकी थीं। कमलू उनको अश्वगंधा और मिश्री का चूर्ण देते हुए बोला-‘कंट्रोल करो गुरु, नया चूरन है, फांका मार कर पानी पी लो आराम मिलेगा। ’गुरु ने फांका मारा नहीं की घंटी घनघनाई। फुन्नी दादा भूखे शेर के तरह फोन पर झपटे। और चोंगा उठाते ही खरगोश बन गए। यह उधर से आयी मधुर आवाज़ का परिणाम था। हेल्लो जी। सुनकर वह अन्दर तक हिल गए थे। सारे पेंच ढीले हो गए थे।
‘क्या आप कन्नी जी के छोटे भाई फुन्नी जी बोल रहे हैं?’
फुन्नी दादा की आवाज़ को जैसे लकवा मार गया था।
‘आँ। म। म। फु। नी। ’
‘जी फुन्नी जी, मैं सुनीता कुमारी कानपुर से बोल रही हूँ। आप कैसे हैं ?’
फुन्नी दादा ने चोंगा सीने से लगा लिया था
कमलू बोला-‘वाह रे गुरु! अब चोंगा सीनें में घुसा ही डालोगे क्या ? जवाब दो उसको, वर्ना समझ जायेगी की लड़का एकदम चोंगा है। ’
‘मैं अब ठीक हूँ, अभी अभी ठीक हुआ हूँ। आपका कबसे इंतज़ार था। कितना मीठा बोलती हैं आप। ’
‘हाँ फुन्नी जी, मेरे पिताजी गन्ने के कारोबारी हैं। इसलिए। ’
‘ वाह सुनीता जी ! मुझे गन्ना बहुत पसंद है, मेरे घर के चारों और गन्ने की फसल है, मेरे पिता जी कोल्हू मालिक हैं’।
कमलू साहू भन्ना का बोला, ’हाँ, हाँ। बाप कोल्हू मालिक हैं और लड़का का कोल्हू का बैल है। देश का सारा गुड़ इनके ही यहाँ बनता है। बस करो गुरु। वर्ना सारा गुड़ गोबर हो जाएगा। ’
फुन्नी दादा सचेत होकर बोले, ’हाँ सुनीता जी, कितना पढ़ी हैं आप ?परिवार में कौन कौन है?’
‘जी सोलहवीं पास हूँ, बापू मम्मी और एक छोटा भाई’
‘आप कितने साल की हैं?’
‘ये क्या पूछ लिया फुन्नी जी, आप भी न। कहीं लड़कियों से उनकी उम्र पूछते हैं ?’
कमलू बोला ‘गुरु यह पूछो कि छोटा भाई आपने कितने साल छोटा है?’
‘अच्छा सुनीता जी। आप क्या पसंद करती हैं?’
‘मैं तो घूमना, खाना बनाना, गाने सुनना, सिलाई कढ़ाई, और दही- बड़े बहुत पसंद करती हूँ, और साड़ियाँ पहनना मुझे बहुत अच्छा लगता है, और आप ?’
‘मुझे दूसरों की पसंद में शामिल रहना पसंद है’
क्या सही जगह तीर मारा था है गुरु अबकी।
फुन्नी दादा करीब आधे घंटे बात करते रहे, जब तक कि उसने यह नहीं कह दिया कि मेरे बापू आ चुके हैं। फुन्नी दादा ने तमाम सारी बातें कर डाली। और अंत में उसका मोबाइल नंबर लेने में सफल रहे।
‘यार कमलू, आज मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत दिन है, और एक वह दिन भी आएगा। –‘फुन्नी वेड्स सुनीता। ’
‘गुरु, इतना खुश मत हो, भाभी जी कि उम्र 25 है और आप पचास के पार निकलने वाले हैं। आपने उसकी उम्र तो पूछ ली पर अपनी उम्र कब तक छुपाओगे?’
‘यार कमलू, यह मौका मैं गंवाना नहीं चाहता कुछ कर कि जवानी जिंदाबाद जो जाए। ’
‘तीन हज़ार का खर्चा आएगा। नया नुस्खा हाथ लगा है। केसर मूसली और मकरध्वज। खिल उठेगो गुरु। बालों के लिए हजार अलग से लगेंगे। भृंगराज की कीमत तो आपको पता ही है। ’
‘तू दवा तैयार कर, मैंने बाप की चोरी से कुछ पैसे जमा किये हैं, निकाल लूँगा’
अब फुन्नी दादा का फोनेन कार्यक्रम नियमित रूप से चलने लगा, शाम सात से आठ बजे तक वह कमलू साहू के पीसीओ से चिपके रहते थे। एक घंटे में करीब सौ रुपये का बिल आता था। फुन्नी दादा का दिल में प्यार भरा जा रहा था और एकाउंट खाली होता जा रहा था।
कमलू ने समझाया-‘देखो गुरु, बात बन नहीं पा रही है। जिन्दगी भर का सवाल है और आप एक घंटे में जवाब ढूंढ लेना चाहते हैं। मेडिकल साइंस कहती है कि आधी रात में लड़की से बात करने से प्यार अंजाम तक पहुँच जाता है। यही वह समय होता है जब प्यार वाला हारमोनियम सुर में बजता है।’ हारमोनियम से उसका मतलब हारमोन से था।
‘तो मोबाइल लेना पड़ेगा। पर अकाउंट तो खाली हो चुका है। ’
‘अरे गुरु ! जब तक कमलू जिंदा है आपको फिकर करने के कोई जरूरत नहीं। मेरे पांच बच्चों के ट्यूशन लगवाने थे, मैं सोच रहा था कि गुरु आपसे ही क्यों न। बदले में आपको मोबाइल दे दूंगा’
फुन्नी दादा भावुक हो गए थे-‘कमलू तू मेरे लिए कितना करेगा। तेरे एहसानों का बदला चुका नहीं पाऊंगा’
कमलू साहू ने फुन्नी दादा को दो हजार का मोबाइल चार हज़ार का बताते हुए दे दिया। और फुन्नी दादा उसके पांच बच्चों को साल भर ट्यूशन पढ़ाने के लिए अनुबंधित हो गए थे।
फुन्नी दादा अब जैसे ही ट्यूशन पढ़ा कर आते, फोन से चिपक जाते। बड़े से बड़ा रावण भी जब रात में गर्लफ्रेंड से बात करेगा तो उसकी आवाज सुरीली हो जायेगी। सो फुन्नी दादा की भी हो जाती थी। दालान में पड़ी एक दूसरी खटिया पर मन्नी दादा सोया करते थे। वह अक्सर रात में उठकर नीम की पत्ती सुलगा देते थे। उनको फुन्नी दादा की आवाज से मच्छरों के भुनभुनाने का भ्रम होता रहता था। इसलिए ऊबकर फुन्नी दादा मंदिर के पास की झोपडी में रात को बिस्तर ले कर चले जाते, तो कभी बाग़ की और प्रस्थान कर जाते। फोन कैसे एक इंसान को गृहत्यागी बना देता है, उसका इससे अच्छा उदाहरण भला और क्या हो सकता है।
हाँ तो समय बीतता गया, बातें होती गयीं। जैसे कि देश में होता आया है। प्यार बढ़ता है तो नाम बिगड़ जाते हैं। यह नाम पड़ोसी ले ले तो लाठियां बरस जाती हैं, और प्रेमी ले तो किस्सियाँ। अब फुन्नी दादा सुनीता के लिए फुनिया जानू हो गए थे और सुनीता उनके लिए सुनिया जानू। सारी रात खुसुर –पुसुर होती रहती थी। अब प्रेम वार्ता फ्री में तो हो नहीं सकती थी। कमलू फुन्नी दादा के मोबाइल में रिचार्ज पर रिचार्ज डाल रहा था, और फुन्नी दादा उसकी दूकान में अनाज की बोरियां। सुनीता ने उनका दिल इस कदर चुरा लिया था कि अब वह मन्नी दादा के नज़रों से छुपा कर भुसैले से गेहूं चुराने लगे थे। आज सुबह एक थैले में एक किलो गेहूं लेकर आये और कमलू को देते हुए बोले –‘भाई, छोटा रिचार्ज कर दे। ’फुन्नी दादा स्वाभिमानी थे उनके संस्कार इस बात की गवाही नहीं देते थे कि सुनीता उनको फोन करे। हाँ, मिस काल कर सकती थी। स्वाभिमान इस कदर हावी था कि वह अब सुनीता का मोबाइल भी रिचार्ज कराने लग गए थे।
फुन्नी दादा सुनिया जानू की हर इच्छा पूरी करते थे। कानपुर में उसके नाम से मनी ऑर्डर भेजते थे, हर त्यौहार उसके लिए साड़ी भेजते थे। इतना प्यार लुटा चुके थे कि खुद लुटने के करीब पहुँच चुके थे। सुनीता उनको कई बार कानपुर बुलाती थी, पर वह टाल जाते थे। असल में उनका कोर्स अभी पूरा नहीं हुआ था। कोर्स? अरे वही जवानी वाला कोर्स जो कमलू साहू करा रहा था। उनको कमलू साहू पर पूरा विश्वास था कि एक दिन वह पच्चीस वाला बदन और बाल पा लेंगे, फिर अपनी सुनिया से मिलने जायेंगे और उसके बापू को ससुर बनाने का प्रस्ताव रखेंगे।
आठ महीने हो गए थे, फुन्नी दादा मन ही मन जवान हो रहे थे। कमलू साहू बहुत होशियार था। किसी कुशल वैध की तरह विशुद्ध मोरल सपोर्ट देता था, और अशुद्ध चूर्ण। खड़िया मिट्टी में पीला रंग और अश्वगंधा मिला कर कर देता था। जिसमें खड़िया मिट्टी सफ़ेद मूसली का और पीला रंग केसर का प्रतीक था। फुन्नी दादा की बालविहीन खोपड़ी देखने का अधिकार सिर्फ कमलू को ही प्राप्त था। वह कहता था-जमीन को इतनी उपजाऊ बना दूंगा गुरु कि फसल तो आयेगी ही आयेगी। ’कमलू के इसी मोरल सपोर्ट ने फुन्नी दादा को अतिआशावादी बना दिया था।
फुन्नी दादा सावन की आशा में प्यार की पेंगे मार रहे थे। इधर भुसैले में से गेहूं की बोरियां गायब हो रही थीं। ऐसे में मन्नी दादा को शक होना लाजिमी था। वह फुन्नी की दिनचर्या का विसद अध्ययन करने लगे। और जल्द पता चल गया कि बेटा इश्कबाजी की चपेट में है। पर मन्नी दादा ताव में नहीं आये। उन्होंने बैठ कर विचार किया और निष्कर्ष यह निकाला कि सारे इश्क की जड़ यह मोबाइल फोन है। इनको ख़त्म करके परिवार को ख़त्म होने से बचाया जा सकता है। उन्होंने मोबाइल को नष्ट करने का फैसला कर लिया।
शाम ढले फुन्नी दादा जब अपना चेहरा साफ़ कर रहे थे, ठीक उसी समय उन्होंने फुन्नी की जेब से मोबाइल साफ़ कर दिया। फिर आम की बाग़ में अपने विश्वस्त पिंटू तिवारी की मदद से सिम का अंतिम संस्कार किया। फिर नश्वर मोबाइल को वहीं बाग़ में दफ़न कर दिया। और विजयी भाव से वापस आ गए। फुन्नी दादा दिन भर मोबाइल खोजते रहे। इंसान पशु पक्षी सबसे पूछते रहे। उनका हाल सीता की खोज में निकले राम जैसा हो गया था। ’हे बबलू हे राम कुमारा। का देखेव मोबाइल हमारा ?’ उनकी लैलागीरी पिंटू तिवारी से देखी न गयी। और उसने मोबाइल की शहादत का आँखों देखा हाल बयाँ कर दिया।
थोड़ी ही देर में ढिबरी के उजाले में वही पिंटू फुन्नी दादा के साथ मोबाइल की कब्र उधेड़ रहा था। और फुन्नी दादा अपने बाप को पारिवारिक गालियों से नवाज रहे थे। दो फिट खुदाई के बाद पिंटू ने जैसे ही फुन्नी दादा को मोबाइल का क्षतिग्रस्त शव निकाल कर दिया। वह मोबाइल को छाती से लगाकर हाय सुनिया हाय सुनिया करते हुए फफक पड़े। -‘हाय रे यह हाल कर डाला, आत्मा कहाँ है इसकी?पिंटू ने कुचला हुआ सिम उनको दिखाया।
‘इतना क्रूर तो अमरीश पुरी नहीं रहा होगा, साले। आत्मा तक को कूच डाला’
पर पिंटू ने उनको ढांढस बंधाया-‘दादा, शरीर तो जीवित है अभी, मोबाइल तो ऑन हो गया है’
‘तो इसमें नयी आत्मा डाल, मुझे तुरंत अपनी सुनिया से बात करनी है’
‘पर स्क्रीन जल रही है सिर्फ। इस पर कोई नंबर नहीं आ रहा है’
‘मैं कह रहा हूँ आत्मा डाल तू, सुनिया का नंबर तो दिल में नोट है’
पिंटू ने फुन्नी दादा के मोबाइल में अपना सिम डाल दिया, जिसमें चार रुपये का बैलेंस शेष था। और उन्होंने चट से सुनिया का नंबर डायल कर दिया। और गीली आवाज में सुनिया। सुनिया। जपने लगे। मोबाइल का माइक टूट गया था जिसकी वजह से इधर की आवाज सुनिया तक नहीं पहुँच पा रही थी। और उधर से किसी जेंट्स की आवाज आ रही थी। जो हैलो कहकर फोन काट दे रहा था।, पर फुन्नी दादा की की चुल बढ़ती ही जा रही थी, सिम में एक रुपये बचे थे। यानी एक मिनट। और इस एक मिनट में फुन्नी दादा पूरी की पूरी सुनामी झेल गए थे। जब उधर से आवाज़ आयी, ’कौन है बे। सामने आ। मेरी लुगाई को रात में फोन करता है। लगता है तूने कमलू साहू का नाम नहीं सुना। फोन रख स्साले। ’
फुन्नी दादा भन्ना गए। कानों के रास्ते करंट पूरे शरीर में फ़ैल गयी। दिमाग फ्लैश बैक में चला गया, एक मिनट में प्रेम की पूरी कैसेट रिवाइंड हो गयी थी। बोले –‘पिंटू एक काम कर। मोबाइल वाला गड्ढा पांच फुट लंबा और आठ फुट गहरा कर दे। ’
‘क्या हुआ दादा ?’
‘कब्र बनवानी है’
‘किसकी ?’
‘खुद की’
‘क्यों दादा, महबूबा बेवफा निकल गयी क्या ?
‘ऐसा कर, दो कब्रें खोद’
‘क्या ज़माना आपको मिलने नहीं दे रहा। या एक फूल दो माली। ’
‘अबे फूल कहकर फूल की बेइज्जती तो न कर ! जिसको फूल समझा था वह तो कटहल निकला। जिसके ऊपर कांटे ही कांटे हैं।, ये बता पिंटू, कमलू की लुगाई का माइका कहाँ है?’
‘कानपुर में। क्यों ?
‘मनी आर्डर याद आ गए, साड़ियाँ याद आ गयीं’
‘ऐसा कर, तीन कब्रें खोद।’
Wednesday, 24 June 2015
क्या तुम लौटा सकती हो??
क्या तुम लौटा सकती हो??
मेरा चाँद
जो तुम्हारे लिए
मैं धरती पर ले आया था
एक दिन...
वह नीला आसमान
लौटा सकती हो
जिस पर तुम उड़ती रही
पंख फैलाकर इन दिनों तक...!!
लौटा सकती हो
वे चिन्ताएँ
वह ख़याल
जो रखा मैंने हर पल
तुम्हारे दुख भरे दिनों में.....??
तो फिर क्यों लौटा रही हो
वह क़िताब
वह ख़त
वह ख़याल....
क्या तुम लौटा सकती हो
वह नींद
वह ख़्वाब
जो आया था
चुपके से
एक दिन तुम्हारे सिरहाने...??
लौटा सकती हो
वह रास्ता
जिस पर तुम मेरे साथ चली थी
वह सीढ़ियाँ
जिस पर बैठकर
तुमने कम किया था
अपना दुख मेरे साथ
पाई थी
तुमने कोई ख़ुशी
मुझसे मिलकर....!!
मैं जानता हूँ
तुम नहीं लौटा सकती हो
नहीं लौटा सकती हो
तुम मेरा स्पर्श
मेरी छाँह
न मेरे बदन की ख़ुशबू
जो तुम्हारे भीतर समा गई थी एक दिन बहुत गहरे
समुद्र की वे लहरें
और वे पुल
तुम नहीं लौटा सकती हो
जिन्होंने कभी मचा दी थी खलबली
तुम्हारे भीतर.......!!
तो फिर क्यों लौटा रही हो??
यह फाइल
यह नक्शा
यह फ़ोटो अलबम
यह पैकेट
जब डूबती हुई शाम नहीं लौटाई जा सकती
नहीं लौटाई जा सकती
वह सुबह
तो क्यों लौटा रही हो?? वे चीज़ें
जो ख़रीदी जाती हैं पैसे से हर बार!!
तुम मेरे आँसू नहीं लौटा सकती
आत्मा की मेरी कराह
मेरी बेचैनी
तो कभी नहीं
नहीं लौटा सकती
जो मैंने तुम्हें अपनी क़िताबों के साथ दी थी मैंने
क्योंकि ये चीज़ें
कभी बेची नहीं जाती.....!!
तुम यह सब लौटाकर
एक सच को
झूठलाने की कोशिश मत करो
एक मनुष्य ने अगर
गुज़ारा है किसी मनुष्य के साथ
कोई ख़ूबसूरत क्षण
तो वह किसी भी सूरत में
नहीं लौटाया जा सकता..!!
तुम कितना भी नाराज़ हो जाओ
पर तुम मेरा प्यार
नहीं लौटा सकती हो
वह तुम्हारी स्मृति में
पड़ा रहेगा महफ़ूज़
जैसे मनुष्य की स्मृति में
पड़ा रहती हैं
नदियाँ और तितलिया
फूल और चाँद!!
Saturday, 20 June 2015
योग या योगा
‘योग’ कि ‘योगा’? उच्चारण दोष क्यों ?
व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाने वाली किसी भी भाषा में उच्चारण की एकरूपता का अभाव एक सामान्य बात है । अंग्रेजी को ही यदि हम लें तो पायेंगे कि उत्तरी अमेरिका की अंग्रेजी आस्ट्रेलिया की अंग्रेजी से उच्चारण में स्पष्टतः भिन्न रहती है, और दोनों ही ब्रिटिश अंग्रेजी से सर्वथा अलग ठहरती हैं । स्वयं ब्रिटेन में सर्वत्र समान उच्चारण की अंग्रेजी का अभाव मिलता है । तदनुसार स्काटलैंड तथा वेल्स की अंग्रेजी तथा ‘लंडनर्स’ की अंग्रेजी (जिसे मानक के तौर पर स्वीकारा गया है) में काफी अंतर दीखता है । यही हाल चीनी भाषा का भी है । चीन के उत्तरी क्षेत्र से दक्षिणी क्षेत्र तक एक ही लहजे और घ्वनियों की भाषा नहीं बोली जाती है । एक बार मेरी भेंट अमेरिका में एक चीनी युवक से हुयी थी, जो मूलतः ताइवान (रिपब्लिक आव् चाइना) का रहने वाला था और अमेरिका में वह ‘कंडक्टेड टुअर’ के ‘गाइड’ का कार्य करता था । उसका अंग्रेजी-उच्चारण अच्छे स्तर का नहीं था । बातों-बातों में उसने बताया था कि उसे चीन (पीपुल्स रिपब्लिक आव् चाइना) के उत्तरी क्षेत्र की बोली समझने में दिक्कत होती है । संयोग से मानक चीनी भाषा (चाइनीज मैंडरिन) की खूबी यह है कि इसकी लिपि सर्वत्र एक है । अतः लिखित तौर पर पूरे चीन में यह बखूबी पढ़ी तथा समझी जा सकती है और यही चीन के लिए लाभ की बात रही है । अन्यथा उच्चारित रूप में वहां भी लोगों को अड़चनें रहती हैं ।
वस्तुतः कोई भाषा किसी क्षेत्र में कैसे बोली जाती है यह वहां की भौगोलिक परिस्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक विरासत जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है । यही कारण है हमारी हिन्दी सर्वत्र एक जैसी नहीं बोली जाती है । इस प्रकार देखा जा सकता है कि हरियाणा में बोली जाने वाली हिन्दी वही नहीं रहती जैसी आंध्र के हैदराबाद में अथवा बिहार के पटना में । संयोग से व्याकरण के नियमों के कारण लिखित हिन्दी कमोबेश सभी जगह एकसमान रहती है । उच्चारण भेद को हम एक दोष के रूप में न देख उस भाषा की स्थानीय विशिष्टता के तौर पर स्वीकार सकते हैं । यह समझना कठिन नहीं है कि क्षेत्रविशेष के सभी मूल निवासी स्वाभाविक तौर पर उसी उच्चारण के आदी होते हैं । हां, पढ़े-लिखे लोग परिष्कृत तथा मानक हिन्दी का आवश्यकतानुसार प्रयोग भी करते देखे जाते हैं ।
परंतु कभी-कभी नितांत अनुचित कारणों से, यथा लोगों की लापरवाही से, उच्चारण में कुछ नये प्रकार के प्रयोग देखने को मिलने लगते हैं जिसे एक दोष के तौर पर माना जाना चाहिए । हिन्दीभाषियों के उच्चारण में ऐसा दोष मैं उनके विदेशों से आयातित उच्चारण में देखता हूं । क्या है यह दोष ?
यह दोष है ‘योग’ शब्द का उच्चारण ‘योगा’ करना और फिर उसके अनुरूप शब्द को ही ‘योगा’ लिख देना । वस्तुतः ऐसे अनेकों उदाहरण उपलब्ध हैं । विचार करने पर मैंने अनुभव किया कि यह शब्द भारतीय योगविद्या के पाश्चात्य जगत् को निर्यात और फिर उसके ‘इंग्लिशीकृत’ तथा ‘परिष्कृत’ संस्करण के आयात के साथ ही यह शब्द हमारे पास पहुंचा है । हम भारतीयों की योगविद्या में रुचि बहुत पहले ही समाप्तप्राय हो चुकी थी । यह तो पाश्चात्य जिज्ञासुओं की योगविद्या पर कृपा हुयी कि उन्होंने उसके न केवल लाभों को स्वीकारा अपितु उसे ‘परिष्कृत’ नाम ‘योगा’ के साथ इस देश को भेंट किया । चूंकि हम भारतीय (वस्तुतः इंडियन) आज भी गुलाम मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके हैं, अतः देश की मौलिक भाषाओं में रुचि खो चुके पढ़े-लिखे लोगों ने जब यूरोप-अमेरिका के नागरिकों के मुख से ‘योगा’ की ध्वनि सुनी होगी तो उन्हें तुरंत विचार आया होगा कि शब्द ‘योग’ के उच्चारण में तो सुधार होना ही चाहिए और साथ ही उसकी वर्तनी (स्पेलिंग्) का भी ‘संस्कार’ किया जाना चाहिए । मैं उच्चारण के साथ वर्तनी की बात इसलिए कर रहा हूं कि मैंने लोगों के मुख से ‘योगा’ ही नहीं सुन रखा है, बल्कि कई स्थलों पर ‘योगा’ लिखा हुआ भी देखा है । कुल मिलाकर ‘योगा’ कहा और लिखा जाना चाहिए, क्योंकि यह यूरोप-अमेरिका के लोगों के उच्चारण पर आधारित है!!
क्या ‘योगा’ उच्चारण दोषपूर्ण नहीं है ? वे लोग जो बेझिझक इस उच्चारण के साथ बात करते हैं उन्हें इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि उन तमाम शब्दों का क्या होगा जो ‘योग’ के आगे उपयुक्त उपसर्ग (प्रीफिक्स) लगाने से प्राप्त होते हैं, यथा अभियोग, आयोग, उद्योग, उपयोग, दुर्योग, नियोग, प्रयोग, वियोग, संयोग, एवं सुयोग आदि । ‘संयोग’ से मैंने लोगों के मुख से अभी ‘उद्योगा’, ‘उपयोगा’ तथा ‘प्रयोगा’ नहीं सुना है । ये शब्द आम बोलचाल में अक्सर प्रयुक्त होते हैं । चूंकि ये शब्द विदेशियों के मुख से शायद ही कभी सुनने को मिलते हैं, अतः इनका उच्चारण हम पारंपरिक तरीके से ही करते हैं । पर जरा सोचिये कि जब ‘योग’ को ‘योगा’ उच्चारित किया जाये तो ‘प्रयोग’ को क्यों न ‘प्रयोगा’ बोला जाये ?
अकारांत शब्दों (जिनका अंत ‘अ’ स्वर ध्वनि के साथ हो) को आकारांत बनाकर बोलने-लिखने की बात केवल ‘योग’ तक सीमित नहीं है । अनेकों ऐसे शब्द हैं जो उच्चारण की दृष्टि से प्रदूषित हो चुके हैं, जैसे ‘अशोका’, ‘कृष्णा’, ‘बुद्धा,, ‘मोक्षा’, ‘रामा’, तथा ‘हिमालया’ आदि । टेलीविजन चैनलों पर मैंने “जब सूर्या मेषा राशि में इंटर करता है ।” जैसे कथनों को भारतीय पद्धति के भविष्यवक्ताओं के मुख से सुना है ।
उच्चारण वास्तव में दोषपूर्ण है इसे समझने के लिए इस सवाल पर मनन करें: क्या यूरोप के अंग्रेजी-भाषी लोग वास्तव में चर्चागत शब्द का उच्चारण ‘योगा’ ही करते होंगे ? प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैंने मानक अंग्रेजी शब्दकोशों का सहारा लिया । मैंने पाया कि ‘योग’ (जिसे yoga लिखा जाता है) के उच्चारण में अ की वही स्वरध्वनि सुनने को मिलती है जो अंग्रेजी के about तथा urgent में प्रथम और nation तथा local में द्वितीय स्वर ध्वनि में है । यह ध्वनि calm, fast, far, तथा ask आदि में विद्यमान आ से सर्वथा भिन्न है । अवश्य ही एक अंग्रेज भी ‘योगा’ नहीं बोलता है । हो सकता है कि हलंत सुनने के आदी हिंदीभाषियों को अ और आ में भेद अनुभव न होता हो ।
यहां पर मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरी समझ में संस्कृत पूर्णतः ध्वन्यात्मक भाषा है, अर्थात् उसके लिपिचिह्नों (देवनागरी) एवं उच्चारित ध्वनियों के बीच एक-का-एक-से का अनन्य संबंध है । तदनुसार संस्कृत में जैसा लिखा जायेगा वैसा बोला जायेगा और जो बोला जा रहा हो वही लिखा जायेगा । लिखित चिह्नों तथा उच्चारित ध्वनियों के मध्य जो असंदिग्ध संबंध संस्कृत में विद्यमान है वह शायद किसी भी अन्य भाषा में नहीं उपलब्ध है ।
अधिकांश भारतीय भाषाओं (दो-तीन भाषाओं को छोड़कर जैसे तमिल तथा सिंधी) की वर्णमाला कमोबेश संस्कृत वाली ही है, भले ही उनमें दो-एक अतिरिक्त वर्ण घटा बढ़ा दिये गये हों, जैसे हिंदी में ड़ ढ़ तथा मराठी में ळ, आदि । अवश्य ही उनकी लिपियों में परस्पर भेद दिखता है । यह भेद बहुत गंभीर नहीं है, क्योंकि प्रायः सबका आधार प्राचीन ब्राह्मी लिपि रही है । परंतु इन भारतीय भाषाओं में उच्चारण की दृष्टि से वह शुद्धता देखने को नहीं मिलती है जो संस्कृत की विशिष्टता है । प्रायः सभी भाषाओं में उच्चारण संबंधी विकार उनके स्वरूप का स्थायी अंग बन चुके हैं । उदाहरणार्थ बांगला में ब तथा व, और ण तथा न में उच्चारण भेद देखने को नहीं मिलता है । इस प्रकार के विकार भाषाओं में स्थापित हो चुके हैं और उनकी विशिष्टता बन चुके हैं । किंतु ‘योग’ का ‘योगा’ उच्चारण इस प्रकार के विकारों में शामिल नहीं है और न ही इस विकार को स्वीकारे जाने की कोई आवश्यकता है ।
उच्चारण संबंधी एक विकार बोलचाल की हिंदी का हिस्सा बन चुका है और जिसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है । यह विकार है अकारांत पदों का उच्चारण हलंत पदों की तरह किया जाना । इस प्रकार ‘कल’ का उच्चारण वैसे ही किया जाता है जैसे ‘कल्’ का (अर्थात् क्+अ+ल्) । इस पद के अंत का अकार अनुच्चारित ही रह जाता है, और यह ध्वनि ‘कला’ के अंत में विद्यमान आ की ध्वनि से स्पष्टतः भिन्न रहती है । हिंदी के इस प्रतिष्ठापित विकार के अनुसार ‘योग’ का उच्चारण ‘योग्’ जैसा होने पर कुछ भी अजूबा नहीं, किंतु ‘योगा’ जैसा तो अस्वीकार्य ही है । अकारांत कुछ पदों की ध्वनि कभी-कभी स्पष्ट सुनाई पड़ती है, भले ही वह अत्यल्पकालिक ही हो, जैसे ‘अन्त’, ‘पक्व’ तथा ‘अल्प’ आदि में ।
हिंदी के विपरीत संस्कृत में हलंत तथा अकारांत पदों के उच्चारणों में भेद स्पष्ट रहता है । इस प्रकार ‘कल’ के उच्चारण में पदांत अ ध्वनि विद्यमान रहती है (उच्चारण – क्+अ+ल्+अ) और यह आ की घ्वनि की तुलना में अल्पकालिक रहती है । ध्यान रहे कि अ ह्रस्व है और आ दीर्घ । दिलचस्प है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के बोलने वाले अकारांत पदों को हलंत उच्चारित नहीं करते हैं । वे वैसा ही उच्चारण करते हैं जैसा संस्कृत में । यह अंतर हिंदीभाषियों और कन्नड़भाषियों के संस्कृत बोलने में भी नजर आता है । कन्नड़भाषी ‘योग’ को वस्तुतः ‘य्+ओ+ग्+अ’ ही बोलता है जो हिंदीभाषियों को कदाचित् आकारांत लगता हो । इस दृष्टि से हिंदीभाषियों का संस्कृत उच्चारण स्तरीय नहीं माना जा सकता है । अब कुछ दक्षिण भारतीय भी ‘योगा’ बोलने लगे हों तो आश्चर्य नहीं होगा ।
हिंदीभाषियों के उच्चारण में अ का लोप अकारांत पदों तक ही सीमित नहीं है । पदों के अंदर भी ऐसा विकार अक्सर दिखाई पड़ता है । उदाहरणार्थ कई लोगों को गलती, जनता, छिपकली आदि शब्दों को क्रमशः गल्ती, जन्ता, छिप्कली आदि उच्चारित करते हुए सुना जा सकता है । अकार का यह विलोपन अभी कदाचित् स्वीकार्य नहीं है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि ‘योग’ को ‘योग्’ और ‘राम’ को ‘राम्’ की भांति उच्चारित करना हिन्दी की विशिष्टता मानकर स्वीकारा जा सकता है । किंतु ‘राम’ को ‘रामा’ बोलना उतना ही हास्यास्पद माना जायेगा जितना ‘रम’ को ‘रमा’ बोलना । क्या ‘योग’ की तर्ज पर हम ‘भोग’, ‘रोग’, ‘ठग’, ‘शक’, एवं ‘काक’ इत्यादि का उच्चारण क्रमशः ‘भोगा’, ‘रोगा’, ‘ठगा’, ‘शका’, एवं ‘काका’ करना आरंभ कर देना चाहिए ? यदि नहीं, तो ‘योगा’ ‘रामा’ आदि के लिए इतना उत्साह क्यों है ? क्या इस प्रकार की मानसिकता पाश्चात्य लोगों के सापेक्ष हमारी हीनभावना का परिणाम तो नहीं ? सोचें ।
Sunday, 14 June 2015
मैं हूँ देशभक्त
मुझे गलत कुछ पसन्द नहीं।
मै हूँ देश भक्त।।
ये जो फुट पाथ पे सोते हैं।
मैने देखा तो नहीं कभी इन्हें,
पर आये दिन चोरी कौन करेगा।
ये ही करते होंगे,
मुझे अपराध से नफरत है,
सबको जेल मे डाल दो,
मैने कहा ना
मै हूँ देश भक्त।।
कल ही ऐक रिक्शे वाला मेरे हाथ से पिट गया,
पाँच रूपये फालतू माँगता था,
मुझे गलत कुछ पसन्द नहीं।
मै हूँ सिद्धांत वादी देश भक्त।।
और वो दो कौडी का पार्क का चौकीदार,
मुझे ज्ञान सुना रहा था।
चाट खाकर दोने बच्चों ने पार्क मे क्या छोड दिये,
उन झूठे दोने को,
उठाने के लिए समझा रहा था।
बोल दिया सचिव को देखता हूँ,
कैसे नौकरी करता है,
भाई टैक्स चुकता हूँ,
मै हूँ देश भक्त।।
लोग मरने को घूमते हैं
किस किस मूर्ख को बचायें,
अभी दो लोग खून से लथपथ सड़क पर पडे थे।
देखना क्या था,
या तो नशेडी होगें या तेज़ रफ्तार।
मरते हैं तो मरें मुझे लापरवाही पसन्द नहीं
मैं हूँ देश भक्त।।
देश का बेडा गर्क हो रहा है,
रोज हत्या, बलात्कार, धमाके।
अधर्मी ही ऐसा करते हैं,
वो कभी मंदिर के रास्ते मे नहीं दिखे,
वो ही देश द्रोही हैं।
मै तो रोज मंदिर जाता हूँ
मै हूँ देश भक्त
मै हूँ देश भक्त।।
ये जो फुट पाथ पे सोते हैं।
मैने देखा तो नहीं कभी इन्हें,
पर आये दिन चोरी कौन करेगा।
ये ही करते होंगे,
मुझे अपराध से नफरत है,
सबको जेल मे डाल दो,
मैने कहा ना
मै हूँ देश भक्त।।
कल ही ऐक रिक्शे वाला मेरे हाथ से पिट गया,
पाँच रूपये फालतू माँगता था,
मुझे गलत कुछ पसन्द नहीं।
मै हूँ सिद्धांत वादी देश भक्त।।
और वो दो कौडी का पार्क का चौकीदार,
मुझे ज्ञान सुना रहा था।
चाट खाकर दोने बच्चों ने पार्क मे क्या छोड दिये,
उन झूठे दोने को,
उठाने के लिए समझा रहा था।
बोल दिया सचिव को देखता हूँ,
कैसे नौकरी करता है,
भाई टैक्स चुकता हूँ,
मै हूँ देश भक्त।।
लोग मरने को घूमते हैं
किस किस मूर्ख को बचायें,
अभी दो लोग खून से लथपथ सड़क पर पडे थे।
देखना क्या था,
या तो नशेडी होगें या तेज़ रफ्तार।
मरते हैं तो मरें मुझे लापरवाही पसन्द नहीं
मैं हूँ देश भक्त।।
देश का बेडा गर्क हो रहा है,
रोज हत्या, बलात्कार, धमाके।
अधर्मी ही ऐसा करते हैं,
वो कभी मंदिर के रास्ते मे नहीं दिखे,
वो ही देश द्रोही हैं।
मै तो रोज मंदिर जाता हूँ
मै हूँ देश भक्त
Sunday, 7 June 2015
हिन्दी की होली
हिन्दी की होली तो हो ली, अब तो समूचे भारत में अंग्रेजी की होली ही हरेक चौराहे पर लहक रही है।
भारत यानी 'इंडिया' ने आज़ादी 'फ्रीडम' हासिल करने के बाद बेहद तरक्की यानी 'प्रोग्रेस' की है। सुई से लेकर हवाई जहाज तक बनाने की बात में कोई खास वज़न नहीं। सुई का फावड़ा तो हिंदुस्तानी पहले भी कर दिया करते थे। अब देख-देखकर हवाई जहाज बनाने लगे, तो कौन सा तीर मार लिया ! प्रोग्रेस के असली मुद्दे तो कुछ दूसरे हैं। उदाहरण के लिए, नहीं-नहीं फॉर एग्ज़ाम्पल, सन् 47 के बाद इतना बदलाव आया, आई मीन चेंज हुआ कि हिंदुस्तानी, हिंदुस्तानी नहीं रह गया। वह बहुत जल्द अपनी असलियत को पहचान गया। अब पंजाबी है, हरियाणवी है, ब्रजवासी है, बुंदेलखंडी है, भोजपुरी है, बिहारी है, मैथिली है, छत्तीसगढ़ी है, उड़िया है, बंगाली है, असमी है, मलयाली है, कन्नड़ी है, द्रविड़ है, केवल मराठी नहीं, देशस्थ है, कोंकणस्थ है, गुजराती है, महाराष्ट्री की जुबान में सौराष्ट्री है, सिंधी है, कश्मीरी है। कितनी खुशी होती है हिंदुस्तान के इस नए 'गार्डन' में खिले हुए नए-नए फूलों को देखकर। आई मीन-हिन्दी वाले फूल, अंग्रेजी वाले 'फूल' नहीं।
यह तो हिंदुस्तान की विशेषता है (क्या कहते हैं अंग्रेजी में विशेषता को? जो भी कहते हों) कि यहां हर आदमी की, हर इलाके की, हर सूबे की अलग-अलग पहचान है। कोई ब्राह्मण है, कोई वैश्य, कोई क्षत्रिय है, कोई हरिजन तो कोई गिरिजन। कोई सूचित है, कोई अनुसूचित, कोई आदिवासी है, कोई वनवासी, कोई सिक्ख है, तो कोई जैन, कोई पारसी है, कोई मुसलमान है और कोई अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का रिप्रेजेंटेटिव यानी क्रिश्चियन। आज़ादी के बाद इन सबको अपनी-अपनी जाति, प्रदेश, भाषा और संस्कृति को विकसित करने का अचूक अवसर दिया है भारत की होनहार लोकप्रिय सरकारों ने। इतिहास में इनकी देन को 'गोल्डन लैटर्स' यानी स्वर्ण-अक्षरों में लिखा जाएगा।
आगे आने वाली पीढ़ियां यों गर्व से सीना फुलाकर यह कहेंगी कि जो काम सम्राट अशोक, हर्ष, चंद्रगुप्त, अकबर, विक्टोरिया और जार्ज नहीं कर सके, वह स्वतंत्र भारत की सरकारों ने केवल 50 वर्षों में करके दिखा दिया। और आप जानते हैं कि इतना बड़ा काम इतने छोटे समय में इतनी आसानी से कैसे होगया। इसका श्रेय यानी 'क्रेडिट' हमारे इंटरनेशनल बनने की सच्ची लगन को है। इसके लिए हमने आमूल-चूल, ओह नो, टाप टू दी बौटम परिवर्तन, आई मीन चेंज करने का बीड़ा उठा लिया। कितनी कड़ी मेहनत करनी पड़ी है, हमारे नेताओं को इसके लिए। अब यही लीजिए कि भारतीयों के अब शादी-विवाह नहीं होते, मैरिज होती है। औरतें गर्भवती नहीं, 'प्रैगनैंट' होती है। उनका जापा नहीं, 'डिलीवरी' होती है। घर में शिशु जन्म नहीं लेता, बाबा या बेबी पैदा होते हैं। बच्चे के पैदा होते ही मां मम्मी हो जाती है और पिता डैडी। बच्चे पाठशाला में नहीं जाते, पेड़-पौधों की तरह नर्सरियों में सींचे-सहेजे जाते हैं। फिर स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी-जहां वे आर्ट्स पढ़ते हैं, साइंस सीखते हैं और वह सब भी, जिनका सीखना पुराने घरों, गंदी गलियों और बेतरतीब बसे हुए शहरों में बड़े-बूढ़ों, पुरानी तहज़ीब से चिपटे, कब्र में पैर लटकाए लोगों के बीच मुमकिन नहीं।
इस बदल का असर सोसायटी में किस कदर हुआ है, उसकी बानगी बाजारों, होटलों, क्लबों, रेस्तराओं और कल्चरल शोज़ में बखूबी देखी जा सकती है। तेजी से बदलते हुए हिंदुस्तान की तस्वीर हेयर स्टाइलों और दाढ़ियों के कट-छंट से देखी जा सकती है। दाढ़ी फ्रेंच कट हुई और बुल्गानिन कट भी, अमरीकी कट भी और इंग्लिश कट भी। औरतों के बाल तो अब कमाल की काबिलियत से कटने लगे हैं। पुराने देहातीपन की निशानी धोती हिंदुस्तान से तेजी से भागी जा रही है। अचकन और शेरवानियों को अलविदा कह दिया गया है और टोपी गांधी बाबा के मरने के साथ ही उतार दी गई है। जब गांधीजी खुद टोपी नहीं पहनते थे, तो हम क्यों पहनें? वह दिन दूर नहीं जब ग्रामवासियों में भी ग्राम, किलो, क्विंटल और किलोमीटर की तरह पूरे देश में पैंट और बुश्शर्ट का चलन आम हो जाएगा।
मगर सॉरी, हिंदुस्तानी औरतों ने अभी तक साड़ी का मोह नहीं छोड़ा है। भई पहनें इसे, लेकिन इसका नाम तो इंटरनेशनल कर दें। पेटीकोट, ब्लाउज, रिबन, लिपस्टिक और क्रीम-पाउडर की तरह साड़ी का भी तो अंतर्राष्ट्रीय नामकरण किया जा सकता है। ठीक वैसे, जैसे अंगूठी का रिंग, हार का नेकलेस, कर्णफूल का इयरिंग और बाजूबंद का आर्मलेट कर दिया गया। कपड़ों का, गहनों का पुराने नामों से और इनके पहनने से देहातीपन झलकता है। जब रसोई किचन होगई, खाने की मेज डाइनिंग टेबल होगई, बैठक ड्राइंगरूम होगई, सोने का कमरा बेडरूम होगया, नाश्ता ब्रेकफास्ट, दोपहर का भोजन लंच और रात का डिनर होगया तो बेलन ब्रेड-रोलर क्यों नहीं हो सकता?
हमें अफसोस है कि लोग अंग्रेजी के गुण और गौरव को बिना समझे उसका विरोध करते हैं। क्या आपने कभी अंग्रेजी में किसी को गालियां दी हैं या किसी से खाई हैं? कितना फोर्स होता है उनमें ! ब्लडी, नॉनसेंस, रासकल के वज़न के शब्द हिन्दी में हैं?
किसी कहने वाले ने सच कहा है कि सत्यनारायण की कथा तो हिन्दी में अच्छी लगती है और गालियां देने का मज़ा अंग्रेजी में ही है। उन्हें जो समझा वह भी मरा और न समझा वह भी मरा ! गालियों को छोड़िए, अध्यात्म को लीजिए। डॉ0 राधाकृष्णन ने कितनी बढ़िया अंग्रेजी में भारतीय दर्शन को विवेचित, सॉरी एनालाइज़ किया है। अब आप ही बताइए कि यदि रवीन्द्रनाथ टैगोर गीतांजलि का अनुवाद अंग्रेजी में नहीं करते तो क्या वे विश्व-कवि बनते या नोबेल पुरस्कार पाते? यह तो आपको पता ही नहीं है कि भारत से अंग्रेज हिन्दुस्तानियों की ताकत के बल पर नहीं गए, वे तो श्रीमती सरोजिनी नायडू की बढ़िया अंग्रेजी की तकरीरों से और गांधीजी के ठोस गूढ़ लेखों और अंग्रेजी तर्कों से तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए तैयार किए नेहरूजी के सारगर्भित अंग्रेजी प्रस्तावों से भागे हैं। इसीलिए तो हमारे अफसर और नेता टूटी-फूटी और ग़लत ही सही, अंग्रेजी बोलते और लिखते नहीं सकुचाते। जब वाल्मीकि मरा-मरा जपकर रामायण लिखने के काबिल होगए तो आज के अंग्रेजीदां लोगों को नाकाबिल कैसे कह सकते हैं? सवाल अंग्रेजी का उतना नहीं है, जितना अंग्रेजियत का है। अंग्रेजियत आदमी को आला इंसान, आला अफसर, ऊंचा डिप्लोमेट और बड़ा व्यापारी बनाती है। हिंदुस्तान के व्यापारी मूर्ख नहीं हैं। वे खुद अंग्रेजी न जान तो इससे क्या हुआ, कूड़ेमल, घसीटाराम आदि सब अपने बच्चों के जन्मदिन पर, मुंडन और कनछेदन पर, विवाह पर अपने मित्रों और सगे-संबंधियों को अंग्रेजी में 'इनवाइट' करते हैं। तभी तो उनका व्यापार छलांगें मार रहा है। हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए उन किशोर-किशोरियों का, उन प्रौढ़-प्रौढ़ाओं का, उन छड़ों-बछड़ों और सांडों का जो घर-बाजार, बस और रेल, शिप और प्लेन, यानी देश और विदेश में परस्पर अंग्रेजी बोलकर दुनिया को यह अहसास दिलाते हैं कि प्रगति की रफ्तार में हम किसी से पीछे नहीं हैं। कुछ सिरफिरे हिन्दी के लोग जो यह दलील दिया करते हैं कि जर्मनी, फ्रांस, इटली, चैकोस्लोवाकिया, पोलेंड, हंगरी और जापान में लोग अंग्रेजी नहीं जानते। अपने इसी अज्ञान के कारण तो ये देश सैकिंड वर्ल्ड वार में हार गए। दक्षिण अफ्रीका के सभी लोग पढ़ गए होते और अंग्रेजियत को स्वीकार, यानी एक्सेप्ट कर लिया होता तो ऐसा खून-खराबा नहीं होता। चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य से बढ़कर देशभक्त, विद्वान और राजनीतिज्ञ कौन हुआ? वे भारत को आने वाली मुसीबतों से बचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी का प्रचार किया। हर्ष की बात है कि राजाजी की बात हम इंडियंस के गले में अच्छी तरह उतर गई, इसलिए आजकल के फादर अपने बच्चों को होनहार बनाने के लिए उन्हें पंखा दिखाकर कहते हैं- बोलो, बोलो-फैन। बिजली की रोशनी दिखाकर कहते हैं- 'लाइट'। बंदर की तस्वीर दिखाकर कहते हैं- बोलो-मंकी। गधे को गधा क्या कहना, कहो-डंकी। ओलम और बारहखड़ी, पहाड़ा और भिन्न भी कोई सीखने की चीजें हैं। उन्हें शुरू से ही वन, टू, थ्री तथा टू टू जा फोर, टू थ्री जा सिक्स सिखाते हैं। बताइए बड़े होकर बाप का और देश का नाम ये ऊंचा करेंगे या वे जिनको शुरू से ही यह सिखा दिया जाता है-ओना मासी धम, बाप पढ़े न हम।
हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए। अन्न बढ़ता है इरीगेशन यानी सिंचाई से और ज्ञान बढ़ता है अंग्रेजी पढ़ाई से। हिंदुस्तानियों की समझ में जितनी जल्दी यह बात आ जाए, उतना अच्छा है। संस्कृति और संस्कृत क्या बला है, यह हमारी समझ में आज तक नहीं आया। हिंदुस्तान और कब तक पोंगापंथी पंडितों, झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं, मीन-मेख निकालने वाले ज्योतिषियों के चक्कर में फंसा रहेगा?
आप ही बताइए कि नक्षत्र शब्द कॉमन है या स्टार? भाग्य के पीछे कब तक भागते रहेंगे, अब 'लक' को आज़माइए। रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्र और शनिवार ज्यादा आमफ़हम हैं या संडे, मंडे...? यह तो अच्छा ही हुआ कि सरकारी मशीनरी में ढाले हुए शब्द रूपी सिक्कों को जनता ने नामंजूर कर दिया, वह टेलीफोन को टेलीफोन ही कहती है, दूरभाष नहीं। टेलीविज़न को टी.वी. कहती है, दूरदर्शन नहीं। सड़क को 'रोड' ही कहती है, मार्ग या पथ नहीं। पुस्तक को 'बुक' ही कहती है, पोथी या किताब नहीं। न्यूज़पेपर को अख़बार नहीं, पेपर कहकर ही खरीदती है। आप ही बताइए कि कलम या लेखनी शब्द एप्रोप्रिएट है या पेन। कलम से तो ऐसा लगता है कि जैसे यह विचारों का सर कलम करने वाली कोई चीज है। और लेखनी तो देखनी भी पसंद नहीं। आज के लेखक को अगर वह फाउंटेन पेन से लिखता है, तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे उसके विचार फाउंटेन की तरह ऊंचे-से-ऊंचे उठकर बुलंदियों को छू रहे हैं और उसकी फुहारें नीचे गिर-गिरकर एटमॉसफियर को ही कोल्ड नहीं, बल्कि लेखक को भी कोल्ड बना रही हैं। भारत में तो हम और हमारे पुरखे हजारों वर्ष रह लिए, लेकिन हमारा रंग काला ही रहा। हम काले, हमारे राम-कृष्ण काले, हमारे ऋषि-मुनि और उनके मुखिया ब्लैक द्वीप वाले, आई मीन कृष्ण द्वैपायन, यानी व्यासजी भी काले थे। केवल कश्मीर के लोगों का रंग गोरा है, इसलिए संसार के बड़े-बड़े देश इसे भारत से अलग करना चाहते हैं।
पिछले 50 वर्षों में हमने दल-बदल की ही ट्रेनिंग नहीं ली, रंग बदलने के लिए भी कम एफर्ट्स नहीं किए गए हैं। कम-से-कम उत्तर भारत में तो रंग बदलने के लिए नए-नए एक्सपैरीमेंट किए जाते रहे हैं और उनमें भारतीयों को सफलता भी मिली है। लेकिन यह पूर्ण सफल तब हो सकता है, जबकि हम अपने आपको अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में पूरी तरह मिला लें। केवल लिबास बदलने से काम नहीं चलेगा, इसके लिए हमें खून भी बदलना पड़ेगा ! तभी हम प्राचीनता के मिथ्या गर्व से, पुरातत्व के उजड़े हुए खंडहरों के मोह से और झूठी-सच्ची कहानियों से भरे इतिहास के माया-जाल से मुक्ति पा सकते हैं। अपने को मिटाकर ही हम कुछ एचीव कर सकते हैं।
विश्व मानवता के विकास की ज़िम्मेदारी अब केवल हिंदुस्तान पर ही है। वह संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, बंगला, मराठी और दक्षिण की भाषाओं के पढ़ने से पूरी नहीं हो सकती। इनको पढ़ने से हम फिर पीछे की ओर लौटेंगे। इसलिए अंग्रेजी को सहभाषा के पद से उठाकर शीघ्र से शीघ्र राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर एस्टेब्लिश कर देना चाहिए। भले ही इसके लिए कांस्टीट्यूशन में चेंज करना पड़े। भले ही इसके लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती ही करनी पड़े। क्योंकि देश की उत्तर-दक्षिण की समस्या को हल करने का यही रास्ता है। हर्ष की बात है कि हमारे नेताओं ने राष्ट्र की एकता के इस मूलमंत्र को अच्छी तरह समझ लिया है। अब मोशनल नहीं, इमोशनल इंटीग्रेशन चाहिए। इस महान कार्य को केवल अंग्रेजी ही कर सकती है।
आप सोचिए- स्वराज हमें किसने दिलाया है? क्या अंग्रेजी पढ़े-लिखों ने नहीं? गांधी, नेहरू, सुभाषचंद्र बोस यदि विदेशों में जाकर अंग्रेजी न पढ़े होते तो मुल्क को फ्रीडम मिलती? जिस भाषा ने संसार से हमारा इंट्रोडक्शन कराया, जिसके कारण ज्ञान-विज्ञान के हमारे लिए दरवाजे खुले, जिसके कारण हम दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता और मद्रास को लंदन, वाशिंगटन और पेरिस बना सके, उस महान मुंहलगी जुबान को हम छोड़ दें, तो हमारे जैसा कृतघ्न कौन होगा? इस कृतघ्न शब्द को ही ले लीजिए, इसे हिंदुस्तान के कितने लोग समझते हैं? केवल काशी और प्रयाग के मुट्ठीभर लोग या यूनिवर्सिटियों में हिन्दी पढ़ाने वाले कुछ दर्जन हिन्दी के लेक्चरर। ये सब देश को रिप्रजेंट नहीं करते। हिंदुस्तान तो सात लाख से भी अधिक गांवों में बसा हुआ है। किसी ग्रामवासी से कृतघ्न शब्द का अर्थ पूछ लीजिए। वह आपके मुंह की ओर ऐसे देखने लगेगा, जैसे उसे भद्दी गालियां दी जा रही हों। अगर हिंदुस्तान को उठाना है तो उसके गांवों को उठाना होगा। भारत के गांव हिन्दी या देशी भाषाओं के सहारे नहीं उठ सकते। वे तो अंग्रेजी से ही उठेंगे। हमें ग्रामवासियों को भी आरंभिक स्टेज से अंग्रेजी पढ़ानी होगी। संसार के वैज्ञानिकों को यह चुनौती है कि क्या वे प्लेग, टी.बी. और मलेरिया की तरह कोई ऐसा इंजेक्शन नहीं तैयार कर सकते, जिससे बच्चा पैदा होते ही अंग्रेजी बोलने लगे? बिना अंग्रेजी के भारत का कल्याण नहीं, और बिना भारत के कल्याण के दुनिया का कल्याण नहीं। क्योंकि हिंदुस्तान ने दुनिया का ठेका ले लिया है, इसलिए उसे अंग्रेजी चलानी ही पड़ेगी।
हम अंग्रेजों को देश से निकाल सकते हैं, अंग्रेजी को नहीं। क्योंकि दासता, जिसका पवित्रतम अर्थ है 'भक्ति', इसलिए अंग्रेजी को मानसिक दासता न कहकर हम इसे विश्वात्मा की पवित्रतम भक्ति के रूप में अंगीकार करते हैं। लोग भले ही कहें कि हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजी को अपनाकर अंग्रेजों की मानसिक दासता अभी तक बरकरार रख छोड़ी है, हम भले और हमारी भक्ति भली।
भारत यानी 'इंडिया' ने आज़ादी 'फ्रीडम' हासिल करने के बाद बेहद तरक्की यानी 'प्रोग्रेस' की है। सुई से लेकर हवाई जहाज तक बनाने की बात में कोई खास वज़न नहीं। सुई का फावड़ा तो हिंदुस्तानी पहले भी कर दिया करते थे। अब देख-देखकर हवाई जहाज बनाने लगे, तो कौन सा तीर मार लिया ! प्रोग्रेस के असली मुद्दे तो कुछ दूसरे हैं। उदाहरण के लिए, नहीं-नहीं फॉर एग्ज़ाम्पल, सन् 47 के बाद इतना बदलाव आया, आई मीन चेंज हुआ कि हिंदुस्तानी, हिंदुस्तानी नहीं रह गया। वह बहुत जल्द अपनी असलियत को पहचान गया। अब पंजाबी है, हरियाणवी है, ब्रजवासी है, बुंदेलखंडी है, भोजपुरी है, बिहारी है, मैथिली है, छत्तीसगढ़ी है, उड़िया है, बंगाली है, असमी है, मलयाली है, कन्नड़ी है, द्रविड़ है, केवल मराठी नहीं, देशस्थ है, कोंकणस्थ है, गुजराती है, महाराष्ट्री की जुबान में सौराष्ट्री है, सिंधी है, कश्मीरी है। कितनी खुशी होती है हिंदुस्तान के इस नए 'गार्डन' में खिले हुए नए-नए फूलों को देखकर। आई मीन-हिन्दी वाले फूल, अंग्रेजी वाले 'फूल' नहीं।
यह तो हिंदुस्तान की विशेषता है (क्या कहते हैं अंग्रेजी में विशेषता को? जो भी कहते हों) कि यहां हर आदमी की, हर इलाके की, हर सूबे की अलग-अलग पहचान है। कोई ब्राह्मण है, कोई वैश्य, कोई क्षत्रिय है, कोई हरिजन तो कोई गिरिजन। कोई सूचित है, कोई अनुसूचित, कोई आदिवासी है, कोई वनवासी, कोई सिक्ख है, तो कोई जैन, कोई पारसी है, कोई मुसलमान है और कोई अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का रिप्रेजेंटेटिव यानी क्रिश्चियन। आज़ादी के बाद इन सबको अपनी-अपनी जाति, प्रदेश, भाषा और संस्कृति को विकसित करने का अचूक अवसर दिया है भारत की होनहार लोकप्रिय सरकारों ने। इतिहास में इनकी देन को 'गोल्डन लैटर्स' यानी स्वर्ण-अक्षरों में लिखा जाएगा।
आगे आने वाली पीढ़ियां यों गर्व से सीना फुलाकर यह कहेंगी कि जो काम सम्राट अशोक, हर्ष, चंद्रगुप्त, अकबर, विक्टोरिया और जार्ज नहीं कर सके, वह स्वतंत्र भारत की सरकारों ने केवल 50 वर्षों में करके दिखा दिया। और आप जानते हैं कि इतना बड़ा काम इतने छोटे समय में इतनी आसानी से कैसे होगया। इसका श्रेय यानी 'क्रेडिट' हमारे इंटरनेशनल बनने की सच्ची लगन को है। इसके लिए हमने आमूल-चूल, ओह नो, टाप टू दी बौटम परिवर्तन, आई मीन चेंज करने का बीड़ा उठा लिया। कितनी कड़ी मेहनत करनी पड़ी है, हमारे नेताओं को इसके लिए। अब यही लीजिए कि भारतीयों के अब शादी-विवाह नहीं होते, मैरिज होती है। औरतें गर्भवती नहीं, 'प्रैगनैंट' होती है। उनका जापा नहीं, 'डिलीवरी' होती है। घर में शिशु जन्म नहीं लेता, बाबा या बेबी पैदा होते हैं। बच्चे के पैदा होते ही मां मम्मी हो जाती है और पिता डैडी। बच्चे पाठशाला में नहीं जाते, पेड़-पौधों की तरह नर्सरियों में सींचे-सहेजे जाते हैं। फिर स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी-जहां वे आर्ट्स पढ़ते हैं, साइंस सीखते हैं और वह सब भी, जिनका सीखना पुराने घरों, गंदी गलियों और बेतरतीब बसे हुए शहरों में बड़े-बूढ़ों, पुरानी तहज़ीब से चिपटे, कब्र में पैर लटकाए लोगों के बीच मुमकिन नहीं।
इस बदल का असर सोसायटी में किस कदर हुआ है, उसकी बानगी बाजारों, होटलों, क्लबों, रेस्तराओं और कल्चरल शोज़ में बखूबी देखी जा सकती है। तेजी से बदलते हुए हिंदुस्तान की तस्वीर हेयर स्टाइलों और दाढ़ियों के कट-छंट से देखी जा सकती है। दाढ़ी फ्रेंच कट हुई और बुल्गानिन कट भी, अमरीकी कट भी और इंग्लिश कट भी। औरतों के बाल तो अब कमाल की काबिलियत से कटने लगे हैं। पुराने देहातीपन की निशानी धोती हिंदुस्तान से तेजी से भागी जा रही है। अचकन और शेरवानियों को अलविदा कह दिया गया है और टोपी गांधी बाबा के मरने के साथ ही उतार दी गई है। जब गांधीजी खुद टोपी नहीं पहनते थे, तो हम क्यों पहनें? वह दिन दूर नहीं जब ग्रामवासियों में भी ग्राम, किलो, क्विंटल और किलोमीटर की तरह पूरे देश में पैंट और बुश्शर्ट का चलन आम हो जाएगा।
मगर सॉरी, हिंदुस्तानी औरतों ने अभी तक साड़ी का मोह नहीं छोड़ा है। भई पहनें इसे, लेकिन इसका नाम तो इंटरनेशनल कर दें। पेटीकोट, ब्लाउज, रिबन, लिपस्टिक और क्रीम-पाउडर की तरह साड़ी का भी तो अंतर्राष्ट्रीय नामकरण किया जा सकता है। ठीक वैसे, जैसे अंगूठी का रिंग, हार का नेकलेस, कर्णफूल का इयरिंग और बाजूबंद का आर्मलेट कर दिया गया। कपड़ों का, गहनों का पुराने नामों से और इनके पहनने से देहातीपन झलकता है। जब रसोई किचन होगई, खाने की मेज डाइनिंग टेबल होगई, बैठक ड्राइंगरूम होगई, सोने का कमरा बेडरूम होगया, नाश्ता ब्रेकफास्ट, दोपहर का भोजन लंच और रात का डिनर होगया तो बेलन ब्रेड-रोलर क्यों नहीं हो सकता?
हमें अफसोस है कि लोग अंग्रेजी के गुण और गौरव को बिना समझे उसका विरोध करते हैं। क्या आपने कभी अंग्रेजी में किसी को गालियां दी हैं या किसी से खाई हैं? कितना फोर्स होता है उनमें ! ब्लडी, नॉनसेंस, रासकल के वज़न के शब्द हिन्दी में हैं?
किसी कहने वाले ने सच कहा है कि सत्यनारायण की कथा तो हिन्दी में अच्छी लगती है और गालियां देने का मज़ा अंग्रेजी में ही है। उन्हें जो समझा वह भी मरा और न समझा वह भी मरा ! गालियों को छोड़िए, अध्यात्म को लीजिए। डॉ0 राधाकृष्णन ने कितनी बढ़िया अंग्रेजी में भारतीय दर्शन को विवेचित, सॉरी एनालाइज़ किया है। अब आप ही बताइए कि यदि रवीन्द्रनाथ टैगोर गीतांजलि का अनुवाद अंग्रेजी में नहीं करते तो क्या वे विश्व-कवि बनते या नोबेल पुरस्कार पाते? यह तो आपको पता ही नहीं है कि भारत से अंग्रेज हिन्दुस्तानियों की ताकत के बल पर नहीं गए, वे तो श्रीमती सरोजिनी नायडू की बढ़िया अंग्रेजी की तकरीरों से और गांधीजी के ठोस गूढ़ लेखों और अंग्रेजी तर्कों से तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए तैयार किए नेहरूजी के सारगर्भित अंग्रेजी प्रस्तावों से भागे हैं। इसीलिए तो हमारे अफसर और नेता टूटी-फूटी और ग़लत ही सही, अंग्रेजी बोलते और लिखते नहीं सकुचाते। जब वाल्मीकि मरा-मरा जपकर रामायण लिखने के काबिल होगए तो आज के अंग्रेजीदां लोगों को नाकाबिल कैसे कह सकते हैं? सवाल अंग्रेजी का उतना नहीं है, जितना अंग्रेजियत का है। अंग्रेजियत आदमी को आला इंसान, आला अफसर, ऊंचा डिप्लोमेट और बड़ा व्यापारी बनाती है। हिंदुस्तान के व्यापारी मूर्ख नहीं हैं। वे खुद अंग्रेजी न जान तो इससे क्या हुआ, कूड़ेमल, घसीटाराम आदि सब अपने बच्चों के जन्मदिन पर, मुंडन और कनछेदन पर, विवाह पर अपने मित्रों और सगे-संबंधियों को अंग्रेजी में 'इनवाइट' करते हैं। तभी तो उनका व्यापार छलांगें मार रहा है। हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए उन किशोर-किशोरियों का, उन प्रौढ़-प्रौढ़ाओं का, उन छड़ों-बछड़ों और सांडों का जो घर-बाजार, बस और रेल, शिप और प्लेन, यानी देश और विदेश में परस्पर अंग्रेजी बोलकर दुनिया को यह अहसास दिलाते हैं कि प्रगति की रफ्तार में हम किसी से पीछे नहीं हैं। कुछ सिरफिरे हिन्दी के लोग जो यह दलील दिया करते हैं कि जर्मनी, फ्रांस, इटली, चैकोस्लोवाकिया, पोलेंड, हंगरी और जापान में लोग अंग्रेजी नहीं जानते। अपने इसी अज्ञान के कारण तो ये देश सैकिंड वर्ल्ड वार में हार गए। दक्षिण अफ्रीका के सभी लोग पढ़ गए होते और अंग्रेजियत को स्वीकार, यानी एक्सेप्ट कर लिया होता तो ऐसा खून-खराबा नहीं होता। चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य से बढ़कर देशभक्त, विद्वान और राजनीतिज्ञ कौन हुआ? वे भारत को आने वाली मुसीबतों से बचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी का प्रचार किया। हर्ष की बात है कि राजाजी की बात हम इंडियंस के गले में अच्छी तरह उतर गई, इसलिए आजकल के फादर अपने बच्चों को होनहार बनाने के लिए उन्हें पंखा दिखाकर कहते हैं- बोलो, बोलो-फैन। बिजली की रोशनी दिखाकर कहते हैं- 'लाइट'। बंदर की तस्वीर दिखाकर कहते हैं- बोलो-मंकी। गधे को गधा क्या कहना, कहो-डंकी। ओलम और बारहखड़ी, पहाड़ा और भिन्न भी कोई सीखने की चीजें हैं। उन्हें शुरू से ही वन, टू, थ्री तथा टू टू जा फोर, टू थ्री जा सिक्स सिखाते हैं। बताइए बड़े होकर बाप का और देश का नाम ये ऊंचा करेंगे या वे जिनको शुरू से ही यह सिखा दिया जाता है-ओना मासी धम, बाप पढ़े न हम।
हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए। अन्न बढ़ता है इरीगेशन यानी सिंचाई से और ज्ञान बढ़ता है अंग्रेजी पढ़ाई से। हिंदुस्तानियों की समझ में जितनी जल्दी यह बात आ जाए, उतना अच्छा है। संस्कृति और संस्कृत क्या बला है, यह हमारी समझ में आज तक नहीं आया। हिंदुस्तान और कब तक पोंगापंथी पंडितों, झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं, मीन-मेख निकालने वाले ज्योतिषियों के चक्कर में फंसा रहेगा?
आप ही बताइए कि नक्षत्र शब्द कॉमन है या स्टार? भाग्य के पीछे कब तक भागते रहेंगे, अब 'लक' को आज़माइए। रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्र और शनिवार ज्यादा आमफ़हम हैं या संडे, मंडे...? यह तो अच्छा ही हुआ कि सरकारी मशीनरी में ढाले हुए शब्द रूपी सिक्कों को जनता ने नामंजूर कर दिया, वह टेलीफोन को टेलीफोन ही कहती है, दूरभाष नहीं। टेलीविज़न को टी.वी. कहती है, दूरदर्शन नहीं। सड़क को 'रोड' ही कहती है, मार्ग या पथ नहीं। पुस्तक को 'बुक' ही कहती है, पोथी या किताब नहीं। न्यूज़पेपर को अख़बार नहीं, पेपर कहकर ही खरीदती है। आप ही बताइए कि कलम या लेखनी शब्द एप्रोप्रिएट है या पेन। कलम से तो ऐसा लगता है कि जैसे यह विचारों का सर कलम करने वाली कोई चीज है। और लेखनी तो देखनी भी पसंद नहीं। आज के लेखक को अगर वह फाउंटेन पेन से लिखता है, तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे उसके विचार फाउंटेन की तरह ऊंचे-से-ऊंचे उठकर बुलंदियों को छू रहे हैं और उसकी फुहारें नीचे गिर-गिरकर एटमॉसफियर को ही कोल्ड नहीं, बल्कि लेखक को भी कोल्ड बना रही हैं। भारत में तो हम और हमारे पुरखे हजारों वर्ष रह लिए, लेकिन हमारा रंग काला ही रहा। हम काले, हमारे राम-कृष्ण काले, हमारे ऋषि-मुनि और उनके मुखिया ब्लैक द्वीप वाले, आई मीन कृष्ण द्वैपायन, यानी व्यासजी भी काले थे। केवल कश्मीर के लोगों का रंग गोरा है, इसलिए संसार के बड़े-बड़े देश इसे भारत से अलग करना चाहते हैं।
पिछले 50 वर्षों में हमने दल-बदल की ही ट्रेनिंग नहीं ली, रंग बदलने के लिए भी कम एफर्ट्स नहीं किए गए हैं। कम-से-कम उत्तर भारत में तो रंग बदलने के लिए नए-नए एक्सपैरीमेंट किए जाते रहे हैं और उनमें भारतीयों को सफलता भी मिली है। लेकिन यह पूर्ण सफल तब हो सकता है, जबकि हम अपने आपको अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में पूरी तरह मिला लें। केवल लिबास बदलने से काम नहीं चलेगा, इसके लिए हमें खून भी बदलना पड़ेगा ! तभी हम प्राचीनता के मिथ्या गर्व से, पुरातत्व के उजड़े हुए खंडहरों के मोह से और झूठी-सच्ची कहानियों से भरे इतिहास के माया-जाल से मुक्ति पा सकते हैं। अपने को मिटाकर ही हम कुछ एचीव कर सकते हैं।
विश्व मानवता के विकास की ज़िम्मेदारी अब केवल हिंदुस्तान पर ही है। वह संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, बंगला, मराठी और दक्षिण की भाषाओं के पढ़ने से पूरी नहीं हो सकती। इनको पढ़ने से हम फिर पीछे की ओर लौटेंगे। इसलिए अंग्रेजी को सहभाषा के पद से उठाकर शीघ्र से शीघ्र राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर एस्टेब्लिश कर देना चाहिए। भले ही इसके लिए कांस्टीट्यूशन में चेंज करना पड़े। भले ही इसके लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती ही करनी पड़े। क्योंकि देश की उत्तर-दक्षिण की समस्या को हल करने का यही रास्ता है। हर्ष की बात है कि हमारे नेताओं ने राष्ट्र की एकता के इस मूलमंत्र को अच्छी तरह समझ लिया है। अब मोशनल नहीं, इमोशनल इंटीग्रेशन चाहिए। इस महान कार्य को केवल अंग्रेजी ही कर सकती है।
आप सोचिए- स्वराज हमें किसने दिलाया है? क्या अंग्रेजी पढ़े-लिखों ने नहीं? गांधी, नेहरू, सुभाषचंद्र बोस यदि विदेशों में जाकर अंग्रेजी न पढ़े होते तो मुल्क को फ्रीडम मिलती? जिस भाषा ने संसार से हमारा इंट्रोडक्शन कराया, जिसके कारण ज्ञान-विज्ञान के हमारे लिए दरवाजे खुले, जिसके कारण हम दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता और मद्रास को लंदन, वाशिंगटन और पेरिस बना सके, उस महान मुंहलगी जुबान को हम छोड़ दें, तो हमारे जैसा कृतघ्न कौन होगा? इस कृतघ्न शब्द को ही ले लीजिए, इसे हिंदुस्तान के कितने लोग समझते हैं? केवल काशी और प्रयाग के मुट्ठीभर लोग या यूनिवर्सिटियों में हिन्दी पढ़ाने वाले कुछ दर्जन हिन्दी के लेक्चरर। ये सब देश को रिप्रजेंट नहीं करते। हिंदुस्तान तो सात लाख से भी अधिक गांवों में बसा हुआ है। किसी ग्रामवासी से कृतघ्न शब्द का अर्थ पूछ लीजिए। वह आपके मुंह की ओर ऐसे देखने लगेगा, जैसे उसे भद्दी गालियां दी जा रही हों। अगर हिंदुस्तान को उठाना है तो उसके गांवों को उठाना होगा। भारत के गांव हिन्दी या देशी भाषाओं के सहारे नहीं उठ सकते। वे तो अंग्रेजी से ही उठेंगे। हमें ग्रामवासियों को भी आरंभिक स्टेज से अंग्रेजी पढ़ानी होगी। संसार के वैज्ञानिकों को यह चुनौती है कि क्या वे प्लेग, टी.बी. और मलेरिया की तरह कोई ऐसा इंजेक्शन नहीं तैयार कर सकते, जिससे बच्चा पैदा होते ही अंग्रेजी बोलने लगे? बिना अंग्रेजी के भारत का कल्याण नहीं, और बिना भारत के कल्याण के दुनिया का कल्याण नहीं। क्योंकि हिंदुस्तान ने दुनिया का ठेका ले लिया है, इसलिए उसे अंग्रेजी चलानी ही पड़ेगी।
हम अंग्रेजों को देश से निकाल सकते हैं, अंग्रेजी को नहीं। क्योंकि दासता, जिसका पवित्रतम अर्थ है 'भक्ति', इसलिए अंग्रेजी को मानसिक दासता न कहकर हम इसे विश्वात्मा की पवित्रतम भक्ति के रूप में अंगीकार करते हैं। लोग भले ही कहें कि हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजी को अपनाकर अंग्रेजों की मानसिक दासता अभी तक बरकरार रख छोड़ी है, हम भले और हमारी भक्ति भली।
Subscribe to:
Posts (Atom)