Saturday, 25 April 2015

पृथ्वी और प्रलय, प्रतिक्रिया या स्वच्छता

भूकंप ने आज मुझे झंकझोर दिया

सोचा क्यूँ होता है ऐसा?

तब मन में आया मेरी धरती तो कराह

रही है अपने ही बच्चों के दिए जख्मों तले

तब मन मे आया कि लिखूं अक कविता

पर किसपे?

होगा क्या मेरे लिखने से क्या बदल पाऊंगा मैं स्वयं को भी?

शायद नही!!

फिर भी एक कोशिश की

शायद कोई और ही समझ सके पृथ्वी की पीड़ा

कुछ पंक्तियाँ है

सिर्फ विचार नही अमल चाहिए!!



निष्क्रिय आवेग से भरी चेतना में

शत् शत् सूर्य के तिरोहित होने का

नीला अंधकार व्याप्त है

आकाश गंगा में डूब गये हैं

रूपहले नक्षत्र


कभी रूप रंग रस गंध से भरी पृथ्वी

आज तिरस्कृत है,

स्वयं ही प्रलय का कारण हम लोग

दोष दें भी तो किसे??


नहीं जानता प्रलय का यह रेला

कहाँ बहा ले जायेगा हमें??

विकराल जल प्रपातों की उत्ताल लहरों पर


तब तक मैं प्रार्थना करता हूँ

बनाओ इस धरती को सुदृढ़, सुसज्जित और हरा-भरा,

ताकि न बहें आँसू, न हो अँधकार और प्रलय!!