Saturday, 30 July 2016

विभीषण की सरकार

श्रीराम और रावण के बीच काँटे की टक्कर हुई। काफ़ी समय तक यह अनुमान लगाना कठिन था कि इस रण में कौन विजयी होगा। एक बड़े रोमांचक मुकाबले में अंतत: विजय श्री राम की हुई। भारतवर्ष के सभी कवियों और गीतकारों ने युद्ध का अदभुत वर्णन किया है। विजेता के पक्ष में तथा हारने वाले के विपक्ष में कई समाचार पत्रों में लेख भी छपे। लोगों ने रामचंद्र की विजय को एक ऐसी विजय के रूप में परिभाषित किया जिससे आने वाले समय की गति का निर्धारण होना था। यह अंधकार पर उजाले की विजय थी! यह अधर्म पर धर्म की विजय थी! असुरों पर सुरों की विजय थी! पाकिस्तान पर भारत की विजय टाईप थी।


लंका देश के कोलंबो नामक ग्राम में एक ग़रीब किसान वास करता था। उसके पास दो बीघा ज़मीन थी जिसपर वह खेती करता था। सरकार को कर देने के बाद उसके पास इतना बच जाता था कि वर्ष भर उसे भोजन के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। इधर इस युद्ध के कारण रावण सरकार ने एक सुरक्षा टैक्स अलग से लगा दिया था जिसकी वजह से किसान की हालत ख़राब थी। युद्ध समाप्त हुआ, रावण के हाथ से सत्ता छिटक कर विभीषण के हाथों में आ गई। विभीषण ने युद्ध से पहले ही श्री राम से गठबंधन कर लिया था। यह तय हुआ था कि लंका का राजा विभीषण बनेगा और समुद्र सेतु पर गुज़रने वाले वाहनों से जो टैक्स मिलेगा वह अयोध्या भेजा जाएगा।
किसान को ऐसा लगता था कि विभीषण के राजा बनते ही सभी समस्याओं का निदान हो जाएगा। विभीषण के समर्थक गाँव-गाँव घूमकर विभीषण के गुणों का गुणगान करते रहते थे। किसान ने ऐसे ही किसी से सुना था कि एक बार विभीषण राजा बन जाए तो उसके गाँव में स्कूल, अस्पताल और पक्की सड़क भी बन जाएगी। गाँव के बाहर जो शुगर मिल, मिल मालिकों एवं रावण सरकार के बीच गन्ने को समर्थन मूल्य के मुद्दे की वजह से पिछले कई बरसों से बंद चल रही थी, वह चालू हो जाएगी। किसान को लगता था कि एक बार मिल चल पड़े तो शायद उसका आवारा लड़का भी वहाँ नौकरी पा जाए तथा भले मानुष का जीवन बिताए। मन ही मन वह भी यह चाहने लगा था कि युद्ध में श्रीराम की ही विजय हो।


जब विभीषण ने सत्ता सँभाली तो लंका की हालत दयनीय थी। एक तो हनुमान ने नगर भर को अग्नि के सुपुर्द करके बड़े-बड़े भवनों एवं अट्टालिकाओं को ध्वस्त कर दिया था वहीं दूसरी ओर इस असमय लड़ाई से राज्य की अर्थव्यवस्था की कमर भी टूट गई थी। विभीषण के सामने रावण के अनेक वर्षों के शासन में हुई गड़बड़ियों का पता लगाने की चुनौती भी थी। लंका में विभीषण राज्य के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए यह भी आवश्यक था कि राज्य की सेना को मज़बूत किया जाए। वानरों के हाथों मिली पराजय से लंका के वीर भीतर तक टूट गए थे। उनके मनोबल को एक बार पुन: ऊँचा उठाने के लिए नए अस्त्रों-शस्त्रों एवं तकनीक का निर्यात भी आवश्यक था। मंत्रिमंडल का गठन, समाज के सभी वर्गों को उनका स्थान दिलाना, बेरोज़गारी की समस्या को सुलझाना, कानून व्यवस्था को सुधारना, जगह-जगह श्रीराम, लक्ष्मण, सीता एवं हनुमान जी की मूर्तियों का अनावरण करना, नगरों एवं विश्वविद्यालयों के नाम बदलना, जनता के मन से कुंभकरण एवं रावण के आतंक को मिटाना आदि कार्य भी विभीषण की प्रमाणित सूची में सबसे आगे थे।


इन सभी कार्यों के लिए धन चाहिए था। सुग्रीव पार्टी के वानर तो सब लूट कर ही गए थे, श्री राम भी पुष्पक विमान अपने साथ ले गए नहीं तो उसी को राजा महाराजाओं को किराए पर देकर कुछ कमाई की जा सकती थी। सागर सेतु से एकत्रित होने वाली चुंगी भी अयोध्या भेजनी पड़ती थी। नल और नील युद्ध के बाद यहीं रुककर पुल की व्यवस्था देख रहे थे तथा उनके रहते इस खेल में धांधली संभव नहीं थी। रावण की वजह से जो हफ़्ता वसूली होती थी वह भी अब समाप्त हो गई थी। तो कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा था कि धन की आवश्यकता थी और धनोत्पादन के सभी मार्ग एक-एक कर के सिमटते जा रहे थे।


ऐसे में विभीषण के सलाहकारों ने आम जनता पर अतिरिक्त कर लगा कर इस समस्या से निपटने का प्लान बनाया। जनता पर बिजली, पानी, घर, क्रय-विक्रय तथा इन्कम टैक्स तो पहले से ही था सुरक्षा टैक्स को भी बरकरार रखा गया तथा अब कुछ नए टैक्स भी इस लिस्ट में शामिल हो गए। किसान एवं आम जनता सरकार के इस फ़ैसले से ख़ासी क्षुब्ध हुई। किसान को ऐसा लगा मानो उसके साथ विश्वासघात हुआ हो। गाँव के जितने लफंगे थे वे अब भी आवारा घूम रहे थे, ना तो मिल खुल रही थी, ना सड़क बन रही थी। इतना ज़रूर हुआ था कि सरपंच जी का भवन अब दुमंज़िला हो रहा था तथा उनका पुत्र मर्सडीज़ नामक रथ विदेश से ले आया था। किसान के लिए रावण राज और विभीषण की सरकार में कोई फ़र्क नहीं था।

Tuesday, 26 July 2016

अल्पसंख्यकवाद के ख़तरे !

3 अगस्त 2015 को जावेद अनीस साहब का एक ब्लॉग पढ़ने के लिए मिला

“बहुसंख्यकवाद के ख़तरे”।

मैंने उनके ब्लॉग पर टिप्पणी भी लिखी पर उन्होने मेरी ही नहीं किसी की भी टिप्पणी का उत्तर या तो दिया नहीं या तकनीकी खराबी से प्रकाशित नहीं हुआ। ब्लॉग काफी लंबा था इसलिए टिप्पणी करने के लिए स्थान कम था। फिर मैंने सोचा क्यों न इसी पर एक ब्लॉग लिख मारू। उनके ब्लॉग की हेड लाइनों पर क्रमवार संक्षिप्त उत्तर दे रहा हूँ।

मोदी के जीतने से मुसलमानों पर हमले बढ़े! / सरसंघचालक ने यह भी कहा है कि आर.एस.एस. के लिए यह अनुकूल समय है, इस समय आर.एस.एस. से जुड़े संगठनों की संख्या और प्रभाव दोनों बढ़ाने हैं।
 
जावेद अनीस साहब ने कुछ घटनाओ का जिक्र किया जो मोदी के जीतने के बाद हुई। मुझे उन घटनाओ के होने से इंकार नहीं है, पर कुछ शरारती तत्वो द्वारा की गयी घटनाओं को जिस प्रकार राजनीतिक दल और मीडिया वाले तूल देते हैं वही काम ब्लोगर ने भी किया। निसंदेह ऐसी घटनाएँ निंदनीय है और नहीं होनी चाहिए। “पर कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता”। हमेशा अगर भगवान हैं तो शैतान भी हैं। यह दुनिया रंग बिरंगी है और इन रंगों मे काला रंग भी है। जहाँ ब्लॉगर ने चंद सिरफिरों की शरारत को हिंदु आतंकवाद की तरह प्रदर्शित किया हम कश्मीर मे आईएसआईएस के झंडे लहराने वाले चन्द सिरफिरों की वजह से हिन्दुस्तान के सारे मुसलमानों को आईएसआईएस का समर्थक या आतंकवादी नहीं मानते। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है की भारत का मुसलमान कभी आईएसआईएस का साथ नहीं देगा। अगर हमारे देश का मीडिया इन चंद सिरफिरों को तवज्जो न दे तो यह सब खुद ही बंद हो जाएगा। मुजफ्फरनगर के दंगे आजम खान की दें हैं, उन्हे पता है की कुछ हिंदु तो उन्हे वोट देंगे ही क्योंकि हिंदु वोट बंटा हुआ है जबकि मुसलमान वोट एक मुश्त मे, एक ब्लॉक मे है। तो कुल मिलाकर वह जीत जाएँगे। पर वह भूल गए अब 67 साल बाद मुसलमान भी इन लोगों को पहचानने लगा है और यह पहली बार है की मुसलमान का वोट भाजपा को मिला है कम ही सही पर मिला है अन्यथा भाजपा को इतनी अधिक सीटें न मिलती। और मोदी इस वोट % को बढ़ाना चाहेंगे न की घटाना। असल मे इन घटनाओं मे इजाफा नहीं हुआ है, कम हुई है। पर मीडिया का शोर ज्यादा है, नेताओं की टिप्पणीया ज्यादा हैं। हर संगठन चाहे आर एस एस हो या अन्य अपना प्रभाव और संख्या बढ़ाना चाहता है। कांग्रेस भी अपना संगठन बढ़ाती है, अन्य दल भी, तो इसमे ऐतराज किस बात का है। क्या आर एस एस को अधिकार नहीं है की वह अपने सदस्यों की संख्या बढ़ाए? जब आर एस एस मुसलमान के खिलाफ बोलेगी तो आप कह सकते हैं। जबकि काफी वर्षों पहले आर एस एस अपना मुस्लिम विरोध छोड़ चुकी है। अब वह सिर्फ राष्ट्र वाद की बात करती है। अब अगर आप राष्ट्रवादी नहीं हो तो आपका ऐतराज समझा जा सकता है।

एक साल हिन्दू राष्ट्रवाद की नीवं

नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के शुरुआत में मुम्बई की गलियों में होर्डिंग्स लगवाये थे जिसमें लिखा हुआ था ‘मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं’। यह एक स्वयंसेवक की सावर्जनिक अभिव्यक्ति थी। आपके इस सवाल का जबाब है की मोदी हिंदु है और राष्ट्रवादी है तो उन्होने क्या गलत कहा। आप एक मुस्लिम है और अगर राष्ट्रवादी है तो कह सकते है की आप मुस्लिम राष्ट्रवादी है। फिर अगर हमारा देश एक हिंदु राष्ट्र बन भी गया तो आपको आपत्ति क्या है? क्योंकि यह तो तय है की आप को दोयम दर्जे का नागरिक नहीं समझा जाएगा। क्योंकि हिंदु राष्ट्रवाद से सिर्फ मुस्लिम ही क्यों भयभीत है? अन्य धर्मों के लोग तो विरोध कराते नहीं सुनाई देते। क्योंकि उन्हे पता है की हिंदु उदार हृदय है, इसलामिक राष्ट्रों की तरह अन्य धर्मो के लोगो को यहाँ दोयम दर्जे का नागरिक नहीं माना जाता न माना जाएगा। सबसे पहले यह बता दूँ की 2014 लोकसभा चुनाव से पहले ही मैंने लिखा था की उन लोगों को मोदी की जीत से निराशा होगी जो यह सोचते है की मोदी के आने से इस देश से मुसलमानों को भगा दिया जाएगा, यह तो अब आर एस एस का भी एजेंडा नहीं है। और उन लोगों को निराशा होगी जो सोचते है राम मंदिर मोदी की प्राथमिकता होगी, मोदी की प्राथमिकता “सबका साथ, सबका विकास” है। वह मंदिर – मस्जिद के पचड़े मे पड़ने वाला व्यक्ति नहीं है। राम मंदिर बनेगा तो अदालत के आदेश से ही बनेगा। मोदी को तो बस देश बनाना है !!

ईसाईयों और मुसलमानों पर हमले

पहला हमला “अल्पसंख्यक” और “सेकुलरिज्म” के कांसेप्ट पर ही है, आर.एस.एस. के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसाबले के बयान पर ध्यान दीजिये जिसमें वे कहते हैं कि “भारत में कोई अल्पसंख्यक नहीं है यहाँ सब लोग ‘सांस्कृतिक, राष्ट्रीयता और डीएनए से हिंदू’ हैं। इसमे भी गलत क्या कहा, यहाँ सभी हिंदुओ को धर्म परिवर्तन करा के या कुछ धर्म मे तो स्वेच्छा से परिवर्तित होकर लोग गए है। इसमे ईसाई और इस्लाम को छोड़ कर।  तो डी एन ए तो हिंदु का ही हुआ न। पंजाब मे हर हिंदु अपने एक बेटे को सिख बनाने की परंपरा निभाता है क्योंकि उसकी नजर मे वह विधर्मी नहीं है, एक ही घर मे जैन और बोद्ध और हिंदु रहते है। इनके बीच रोटी – बेटी का व्यवहार भी है। इस्लाम धर्म अपनाने के बाद भी मुसलमान अपने नाम के आगे चौधरी, पटेल, राणा आदि जाती सूचक शब्द क्यों लगाते है? क्योंकि वह जाताना चाहते है की वह दलित से परिवर्तित होकर मुसलमान नहीं बने है। ईसाई बने लोग भी यह अपने मित्रों को यह बताते हैं की वह दलित से परिवर्तित नहीं है। शादी ब्याह मे वह पता कराते है की धर्मपरिवर्तन से पूर्व वह जब हिंदु थे तो किस जात के थे। जो अशरफ, कुरेशी लिखते है उनका क्या और क्यों? क्योंकि डी एन ए तो हिंदु ही है। ईसाइयों पर हमले की पोल भी खुल चुकी है, कहीं पर तो वह ईसाई ही थे, या व्यक्तिगत कारण थे, या चोरी और शरारत ही उनका मकसद था। चोरियाँ तो मंदिरों मे ज्यादा होती है, सबसे ज्यादा होती है क्योंकि वहाँ सोना – चांदी, प्राचीन मूर्तियाँ होती है। चर्च मे दान पात्र के लिए चोरी होती है।  

वैश्विक चिंताये

जनाब जब कांग्रेस का ही राज था स्वयं राहुल गांधी ने हिंदु उग्रवाद की बात अमेरिकी राजदूत से की थी। अब इन तथाकथिक धर्मनिरपेक्ष दलों के पेट मे दर्द हो रहा है और यही है जो लाबीङ्ग करके ऐसे बयान दिलवा रहे है। मेरे एक अमेरिकी मित्र ने ओबामा के उस बयान की अमेरिका मे कितनी निंदा हुई यह मुझे बताया जिसमे उन्होने मोदी सरकार को अल्पसंख्यकों के हित की बात कही थी और वह गोरा ईसाई अमेरिकन है। आज सारा विश्व मोदी की तारीफ कर रहा है, कभी केमरून उन्हे “मैन आफ़ एक्शन” कहते है, ओबामा उन्हे “भारत मे सुधारों के मुखिया” की उपाधि देते है। चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस सहित विश्व उनकी तारीफ कर रहा है, पर आखे बंद हों तो कुछ दिखाई नहीं देता, जो विचारों मे हो वही सपने आते रहते हैं और ब्लॉग लिख मारते हैं।

बदलता माहौल और बहुसंख्यकवाद के खतरे

माहोल बदल रहा है इससे सहमत हूँ पर देश की भलाई की ओर जा रहा है, जिससे परेशान होकर, मुसलमानों को मोदी से भयभीत करने की कोशिश हो रही है। इसके लिए हर साम दाम, दंड – भेद नीति का प्रयोग हो रहा है। चाहे मीडिया हो, ब्लॉगर हों, देश विदेश मे बैठे एजेंट हों। अब हमारे क्षेत्र मे वार्ड चुनाव मे 240 मुस्लिम वोट थे और कांग्रेस को मात्र 2 मिले, जीता भाजपा का उम्मीदवार सही मे माहोल बदल रहा है। यह अच्छी बात है की मुसलमान अपना हित – अहित किसमे है समझ रहा है। मैंने मोदी जी को चुनावो के समय एक सुजाव दिया था उनकी फेस्बूक पर जाकर और ट्वीट करके भी की पूर्वी उत्तर प्रदेश मे बुनकरों की हालत 1980 से दयनीय हो गयी है, जिसमे अधिकतर मुसलमान हैं, इसलिए उनके लिए कुछ किया जाना चाहिए और उन्होने बात सुनी, बुनकरो के लिए एक योजना भी बनाई, पर आपकी धर्मनिरपेक्ष राज्यसरकार उसके लिए जमीन उपलब्ध नही करा रही है। उधर भूमि अधिग्रहण बिल भी लटका रही है, संसद चलाने नहीं दे रही है। इसलिए इस देश को ख़तरा बहुसंख्यकवाद से नहीं अल्पसंख्यकवाद से है। इस देश की ख़तरा अल्पसंख्यकवाद के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकान चलाने वालों से है।

Monday, 25 July 2016

भविष्य इतिहास

इतिहास की घंटी में मास्टर जी पढ़ा रहे थे | 

इतिहास भूगोल के बारे में तो कहा जाता है की  "इतिहास भूगोल बड़ी बेबफा, रात को याद सुबह सफा".

खैर इस कहावत का इस इतिहास की क्लास से कोई मतलब नहीं है | मास्टर जी पढ़ा रहे थे हम पढ़ रहे थे की हस्तिनापुर के राजा युधिस्ठिर के 4 भाई थे युधिस्ठिर को लेके 5 और कर्ण को लेके 6 . पर कर्ण ने बचपन में घर छोड़ दिया था . और अपने चचेरे भाई दुर्योधन के साथ रहता था . पांचो पांडवो की शादी द्रोपदी से हुई थी . पांचो पांडव ख़ुशी खुशी अपना जीवन यापन कर रहे थे . की शकुनी मामा ने युधिस्ठिर को जुए में हरा के उनका सारा राज पाट हड़प लिए . ये तो युधिस्ठिर गलती थी जुए पे आज की सरकार ने बैन लगा रखा है . क्या ये बात उस टाइम के लोगो को नहीं पता थी क्या ?

जुए में घर बार हारने के बाद जंगल में जाना पड़ा बनवास के लिए.  बनवास करते करते वे पुरे भारत का भ्रमण कर लिए. जंगल में इह्नोने कई देशो से लडाईयां की. जिसमे इन्होने अफगानिस्तान को पूरी तदाह बर्बाद कर दिया .इसी क्रम में इनकी दोस्ती कृष्ण भगवन से हुई. वे इनके परम मित्र बन गए. फिर ये यात्रा करते हुए थोडा और आगे बड़े . रास्ते में द्रोपदी को एक जगह प्यास लगी . द्रोपदी ने पानी पिने की इच्छा जताई .युधिष्ठिर ने भीम को पानी लाने के लिए कहा .भीम पानी लाने ले लिए चल पड़े .भीम के गए काफी देर हो गए , वे वापस नहीं आये .युधिस्ठिर ने अर्जुन को भेजा . अर्जुन गए तो गए ही रह गए , आये नहीं .एक - एक कर के युधिष्ठिर ने अपने सारे भाइयों को पानी के तलाश में भेज दिया काफी देर के बाद भी कोई वापस नहीं आया. तो युधिस्ठिर खुद पानी और अपने भाइयों की तलाश में निकले.

टहलते ट
हलते वे एक तालाब के किनारे पहुचे तो देखा की उनके चारो भाई अचेतन हुए पड़े हैं. उन्होंने सोचा की प्यास से बेहोश हैं. इनके चहरे पे पानी का छिटा मार के होश में लाया जाये . जैसे ही पानी लेने के लिए तालाब पे झुके तालन से आवाज आई अगर पानी पीना है तो मेरे प्रश्नों का जबाब देना पड़ेगा तुमको . युधिष्ठिर ने पूछा कौन हो आप? तालाब से आवाज़ आई मैं कौन बनेगा करोड़पति से अमिताभ बच्चन बोला रहा हूँ . युधिस्ठिर मान गए . सवाल जवाब देना उनके बाएं हाथ का खेल था .

अपने गुरु द्रोन की क्लास में हमेशा वो 95% नंबर जो लाते थे . 100% भी लाने की तयारी थी पर तब ग्रेडिंग की व्यवस्था हो गयी . यहाँ पे उन्होंने अमिताभ बच्चन के 100 सवालो का सही सही जबाब दिया . अमिताभ बच्चन ने खुश होके कहा- परीक्षार्थी, परीक्षक से ज्यादा ज्ञानवान है .फिर युधिस्ठिर ने अपने भाइयो पे पानी के छिटके मारे. पानी के छिटके पड़ते ही सरे पांडव होश में आये गए . होश में आते ही उन्होंने युधिस्ठिर से सवाल की - भाईजान आप हम पे ये पानी के छिटके मार के होली क्यों मना रहे हो .. तभी से हम होली का त्यौहार मानते आ रहे हैं .

वह से पांचो पांडव पानी ले द्रोपदी के पास पूछे . पर उनको वह पे द्रोपदी नहीं मिली .उन्होंने अपने आस पास का सारा जंगल छान मारा . रास्ते में उनको जटायु मिला . उसने बताया - लंका का राजा रावण आपकी द्रोपदी का हरण कर के ले जा रहा था . मैंने विद्रोह करने की कोशिश की तो उसने मेरे पंख ये कह के का दिया की - ये पंख हमके डेड जटायु . मैं द्रोपदी को बचा नहीं पाया .जटायु के दिशा निर्देश पे पे आगे बड़े . रास्ते में उनको हनुमान जी मिले .हनुमान जी ने उनको सुग्रीव से मिलाया . सुग्रीव ने बताया की अगर उनको उसकी मदद चाहिए तो बदले में उसको , उसके भाई बाली का राज्य दिलाना होगा .पांडव तैयार हो गए.युधिस्ठिर ने अपने भाई भीम को बाली से लड़ने के लिए भेजा . भीम ने बाली को मल्लयुद्ध में बाली को पछाड़ दिया और उसके पैर पकड़ के दो तुकडे कर दिए . बाली की जगह सुग्रीव राजा बन गया .बाली को इतिहास में जरासंध के नाम से भी जाना जाता है.सुग्रीव ने अपने वादे के अनुसार हनुमान को द्रोपदी की खोज में भेजा .हनुमान ने पता लगाया की द्रोपदी को लंका के राजा रावण ने अशोक वाटिका में रखा है.

द्रोपदी का पता लगते ही पांडवो ने लंका पैर चढाई करने की योजना बनाई. लंका की तरफ बदते हुए वे जा पहुचे कन्याकुमारी. वहां से आगे जाने का मार्ग बंद था तो उन्होंने नल नील को बुला के सागर के उपर पूल बनाने का टेंडर देने को कहा . नल नील पूल बनाने के लिए तैयार हो गय. पूल बनाना चालू हो गया. पांडव रोज़ ही पूल की गुद्वात्ता की जाँच करते थे की कही इसमें नकली माल तो नहीं खपाया जा रहा है . कड़ी मेहनत और लगन से pool तैयार हो गयी . उसपे चढ़ के वे लंका की डरती पे उतारे ही थे की वहा के कस्टम वालो ने पासपोर्ट और वीसा की जाँच शुरू कर दी . कई लोग अंदर ही . पांडवो के पास भी पासपोर्ट और वीसा नहीं था .वनवास पे जाने के पहले दुर्योधन ने उनका पासपोर्ट और वीसा अपने पास जमा कर के देश से बहार जाने से मना किया था . कस्टम वाले पांडवो को अंदर ले जाने वाले ही थे की विभीषण वहा आ गए . उन्होंने पांडवो के सामने एक शर्त राखी . की अगर तुम को रावण को मारने का रास्ता बताऊ तो तुमको मुझे लंका का राजा बनाना पड़ेगा और बदले में मैं तुमको द्रोपदी को वापस कर दूंगा .

पांडव तैयार हो गए .बहुत घमासान लडाई हुई और रावण मारा गया . 

पांडव अपनी द्रोपदी को लेकर वापस हस्तिनापुर की ओर निकले नासा के सुपर सौनिक जेट से के रास्ते मे कश्मीर नामक एक जगह मिली फिर वहाँ पे उन्होने अल्पसंख्यक समुदाय पे बहुत अत्याचार किए और वहाँ के हिन्दु पंडितो को अपने साथ ले गए तथा वहाँ पे एक क्रूर फौज लगा दी जो तब से कई सौ सालों तक इन मासूम लोगों पर पैलेट से आक्रमण करती रही फिर भी मासूमों ने कभी विद्रोह नही किया तत्पश्चात पांडव हस्तिनापुर आ गए और ख़ुशी ख़ुशी राज्य करने लगे .

नोट :यह आज के एक द सौ साल बाद के इतिहास के किताब के एक अध्याय से लिए गया है .

समर्पित :उन इतिहासकारों और सरकारों के नाम पे जो इतिहास को अपने मन से लिखवाते और स्कूल में पढ़ाते है . दूसरी सरकार आती है और उनमे फेरबदल कर के दुबारा से छपवाती है .

Saturday, 23 July 2016

१५ बेतों की सजा

पंद्रह बेतों की सज़ा

फिरंगियों से  बचने के लिए एक हट्टा कट्टा युवक एक तूफानी रात को एक घर में जा पहुंचा | वहां एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। युवक को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया लेकिन जब युवक ने अपना परिचय दिया तो उसने उन्हें ससम्मान अपने घर में शरण दे दी | बातचीत से युवक को आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में कठिनाई आ रही है | उस युवक ने महिला को कहा, "मेरे सिर पर पांच हजार रुपए का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर मेरी गिरफ़्तारी पर पांच हजार रुपए का इनाम पा सकती हैं ! जिससे आप अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं !"


यह सुन विधवा रो पड़ी, "भैया ! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है | मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती |" यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र युवक के हाथों में बाँध कर देश-सेवा का वचन लिया | सुबह जब विधवा की आँखें खुली तो युवक जा चुका था और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- “अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आज़ाद।”


ऐसा नहीं था की “आज़ाद” के जीवन का सिर्फ़ यही एक प्रसंग है जिसे याद किया जा सके | उनका जन्म एक आदिवासी ग्राम भावरा में 23 जुलाई, 1906 को हुआ था | उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गाँव के रहने वाले थे | भीषण अकाल पड़ने के कारण वे अपने एक रिश्तेदार का सहारा लेकर 'अलीराजपुर रियासत' के ग्राम भावरा में जा बसे थे | इस समय भावरा, मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले का एक गाँव है | उनकी आर्थिक स्थिति ऐसे में अच्छी तो नहीं ही थी |


पंडित सीताराम तिवारी स्वाभिमानी तो थे ही ऊपर से जरा सख्त स्वभाव के भी थे | एक बार जब घर में नमक न होने पर उनकी पत्नी पड़ोसी से नमक मांग लायी तो सजा के तौर पर पूरे परिवार ने चार दिन तक बिना नमक का खाना खाया था | बचपन आदिवासी इलाकों में गुजरने के कारण चंद्रशेखर छोटी उम्र में ही निशाना लगाना भी सीख गए थे |


एक बार गाँव के सारे बालक मिलकर दीपावली की खुशियाँ मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझड़ियाँ थीं, किसी के पास पटाखे थे और किसी के पास मेहताब की माचिस | बालक चन्द्रशेखर के पास इनमें से कुछ भी नहीं था | वह खड़ा–खड़ा अपने साथियों को खुशियाँ मनाते हुए देख रहा था। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, वह उसमें से एक तीली निकालता और उसके छोर को पकड़कर डरते–डरते उसे माचिस से रगड़ता और जब रंगीन रौशनी निकलती तो डरकर उस तीली को ज़मीन पर फेंक देता था |

बालक चन्द्रशेखर से यह देखा नहीं गया, वह बोला, "तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते। मैं सारी तीलियाँ एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूँ |" जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, उसने वह चन्द्रशेखर के हाथ में दे दी और कहा, "जो कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूँ !"


बालक चन्द्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियाँ निकालकर अपने हाथ में ले लीं | वे तीलियाँ उल्टी–सीधी रखी हुई थीं, मतलब कुछ तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की तरफ़ भी था। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क करके सारी तीलियाँ जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चन्द्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर चन्द्रशेखर की हथेली को जलाने लगीं। असह्य जलन होने पर भी चन्द्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं छोड़ा, जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नहीं हो गई। जब उसने तीलियाँ फेंक दीं तो साथियों से बोला, "देखो हथेली जल जाने पर भी मैंने तीलियाँ नहीं छोड़ीं |"


उसके साथियों ने देखा कि चन्द्रशेखर की हथेली काफ़ी जल गई थी और बड़े–बड़े फफोले उठ आए थे। कुछ लड़के दौड़ते हुए उसकी माँ के पास घटना की ख़बर देने के लिए जा पहुँचे। उसकी माँ घर के अन्दर कुछ काम कर रही थी | चन्द्रशेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी बाहर के कमरे में थे | उन्होंने बालकों से घटना का ब्योरा सुना और वे घटनास्थल की ओर लपके। बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिताजी को आते हुए देखा तो वह जंगल की तरफ़ भाग गया। उसने सोचा कि पिताजी अब उसकी पिटाई करेंगे। तीन दिन तक वह जंगल में ही रहा। एक दिन खोजती हुई उसकी माँ उसे घर ले आई | उसने यह आश्वासन दिया था कि तेरे पिताजी तेरे से कुछ भी नहीं कहेंगे |


चन्द्रशेखर जब बड़े हुए तो वह अपने माता–पिता को छोड़ कर बनारस  जा पहुँचे | उनके फूफा जी पंडित शिवविनायक मिश्र बनारस में ही रहते थे | कुछ उनका सहारा लिया और कुछ खुद भी जुगाड़ बिठाया और 'संस्कृत विद्यापीठ' में भर्ती होकर संस्कृत का अध्ययन करने लगे | उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी | विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेट कर धरना देते थे | 1919 में हुए जलियाँवाला बाग़ नरसंहार ने चंद्रशेखर को काफ़ी व्यथित किया था |


चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे | तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी | जब गांधीजी ने सन् 1921 में असहयोग आन्दोलन का फरमान जारी किया तो वह आग  ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली और आखरी बार गिरफ़्तार हुए |


उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट की अदालत में पेश किया गया | मि. खरेघाट बहुत कड़ी सजाएँ देते थे | उन्होंने बालक चन्द्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया -
"तुम्हारा नाम क्या है?"
"मेरा नाम आज़ाद है।"
"तुम्हारे पिता का क्या नाम है?"
"मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।"
"तुम्हारा घर कहाँ पर है?"
"मेरा घर जेलखाना है।"


मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए | उन्होंने चन्द्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सज़ा सुना दी | उस समय चन्द्रशेखर की उम्र केवल चौदह वर्ष की थी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चन्द्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चन्द्रशेखर को बचपन से ही था | वह हर बेंत के साथ "महात्मा गांधी की जय" या "भारत माता की जय" बोलते जाते था। जब पूरे बेंत लगाए जा चुके तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। बालक चन्द्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुँह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गया। इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मान सहित उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चन्द्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चन्द्रशेखर आज़ाद कहलाने लगे |


इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है- ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को  आज़ाद  कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह 'भारत माता की जय!'चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया।

बाद में वही लड़का उत्तर भारत के "आतंककारी" कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना | पं०जवाहरलाल नेहरू [ 1. जवाहरलालनेहरू (अनुवादक: हरिभाऊ उपाध्याय) मेरी कहानी  1995 पेज 73-74 और 2. मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास (भाग-दो) पेज 474]


और इस तरह बनारस केन्द्रीय कारागार की उस 15 बेतों की सज़ा ने चंद्रशेखर को चंद्रशेखर “आज़ाद” बना दिया |


With Respect: Anand Kumar

Saturday, 9 July 2016

मेरे देश की कहानी एक स्वर्गीय वीर की जुबानी

 धाँय ....धाँय ....धाँय .....

तीन गोलियां मुझे लगी ,ठीक पेट के ऊपर और मैं एक झटके से गिरा....गोली के IMPACT और जमीन की ऊंची -नीची जगह के घेरो ने मुझे तेजी से वहां पहुचाया , जिसे NO MAN'S LAND कहते है ... मैं दर्द के मारे कराह उठा.. पेट पर हाथ रखा तो देखा भल  भल  करके खून आ रहा था .. अपना ही खून देखना ... मेरी आँखे मुंदने लगी ... कोई चिल्लाया , मेजर , WE ARE TAKING YOU TO HOSPITAL.....देखा तो मेरा दोस्त था ...मेरे पास आकर बोला " चल साले , यहाँ क्यों मर रहा है , हॉस्पिटल में मर "... मैंने हंसने की कोशिश की ,उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे मेरे चहरे पर....

मेरी आँखे बंद हो गयी तो कई IMAGES मेरे जेहन में आने लगे , मैं मुस्करा उठा, कही पढ़ा था की मरने के ठीक १५ मिनट पहले सारी ज़िन्दगी याद आ जाती है ... मैंने AMBULANCE की खिड़की से बाहर  देखा, NO MAN'S LAND पीछे छूट रहा था .. ...ये भी अजीब जगह है यार , मैंने मन ही मन कहा ......

कोई और IMAGE सामने आ रही थी , देखा तो , माँ की थी , एक हाथ में मेरा चेहरा थामकर दुसरे हाथ से मुझे खिला रही थी और बार बार कह रही थी की मेरा राजा बेटा सिपाही बनेंगा ....मुझे जोरो से दर्द होने लगा .......NEXT IMAGE मेरे स्कूल की थी , जहाँ १५ अगस्त को मैं गा रहा था , नन्हा मुन्हा राही हूँ ,देश का सिपाही हूँ .......स्कूल का HEADMASTER ने मेरे सर पर हाथ फेरा ...मैंने माँ को देखा वो अपने आंसू पोंछ रही थी .....मेरे पिताजी भी फौज में थे .....ज़िन्दगी का विडियो बहुत ज्यादा FAST FORWARD हुआ अगली IMAGE में सिर्फ WAR MOVIES थी जिन्होंने मेरे खून में और ज्यादा जलजला पैदा किया ....

NEXT IMAGE में एक लड़की थी जिसके बारे में मैं अक्सर सोचता था...वो मुझे इंजिनियर के रूप में देखना चाहती थी , मैं आर्मी ऑफिसर बनना चाहता था .. एक उलटी सी आई , जिसने बहुत सा खून मेरे जिस्म से निकाला , मेरा दोस्त ने मेरा हाथ थपथपाया .."कुछ नहीं होंगा साले "....अगली IMAGE में उसकी चिट्टियां और कुछ फूल जो सूख गए थे ,किताबो में रखे रखे ..उसे वापस करते हुए मैंने NDA की ओर चल पड़ा ...

NEXT IMAGE में हम सारे दोस्त ENEMY AT THE GATES की कल्पना अपने देश की सरहद पर कर रहे थे ....क्या जज्बा था यारो में , हमारे लिए देश ही पहला GOAL था , देश ही आखरी GOAL था......और , मैं आपको बताऊँ   , WE ALL WERE WAITING FOR OUR ENEMIES AT THE GATE .........

अगली IMAGE में मेरे माँ के आँखों में आंसू थे गर्व के ; तीन साल के बाद की PASSING PARADE में वो मेरे साथ थी और मैं उसके साथ था  . हमने एक साथ आसमान को देखकर कहा ....हमने आपका सपना साकार किया ........

अगली IMAGE एक तार का आना था , जिसमे मेरी माँ के गुजरने की खबर थी .....मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा PILLAR गिर गया था ... मुझे फिर उलटी आई .....मेरा दोस्त के आंसू सूख गए थे , मुझे पकड़कर कहा, "साले तेरे पीछे मैं भी आ रहा हूँ .....तू साले , नरक में अकेले मजेलेंगा..ऐसा मैं होने नहीं दूंगा" ......मैंने मुस्कराने की कोशिश की ...

सबसे प्यारी IMAGE  आई ..मेरी बेटी ख़ुशी की ......उसे मेरी फौज की बाते बहुत अच्छी लगती थी....मेरी छुट्टियों   का उसे और मुझे बेताबी से इन्तजार रहता था ... मेरी पत्नी की IMAGE जो थी वो हमेशा सूखी आँखों से मुझे विदा करने की थी .......उसे डर लगता था की मैं .....मुझे कुछ हो जायेंगा .... इस बार उसका डर सच हो गया था ... मेरी बेटी की बाते ...कितनी सारी बाते ....मेरी आँखों में पहली बार आंसू आये ... मुझे रोना आया ..मैंने आँखे खोलकर दोस्त से कहा ..यार , ख़ुशी .......,इतनी देर से वो भी चुप बैठा था ,वो भी रोने लगा .......

अब कोई IMAGE नहीं आ रही थी ...एक गाना याद आ रहा था ....कर चले वतन तुम्हारे हवाले साथियो..... मैंने दोस्त से कहा , यार ,ये CIVILIANS  कब हमारी तरह बनेगे .. हम देश को बचाते है ..ये फिर वहीँ ले आते है जिसके लिए हम अपनी जान......एक जोर से हिचकी आई मैंने दोस्त का हाथ जोर से दबाया .....और फिर एक अँधेरा...........

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PART TWO
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दूसरी सुबह कोई बहुत ज्यादा CHANGE नज़र नहीं आया मुझे इस देश में जिसके लिए मैंने जान दे दी..... ENEMIES WERE STILL AT THE GATE ... 
NEWSPAPER में कहीं एक छोटी सी खबर थी मेरे बारे में .....

POLITICIAN WERE MAKING USELESS STATEMENTS.....

किसी क्रिकेटर की फिल्डिंग की तारीफ़ की बड़ी खबर थी .....
कोई ये भी तो जाने की एक एक इंच जमीन की FIELDING करते हुए हम जान दे देते है .....

कोई मीडिया का राज EXPOSE हुआ था .... कोई सलेब्रटी की मौत हुई थी जिसे मीडिया लगातार COVERAGE में दे रहा था ... कोई रिअलिटी शो में किसी लड़की के AFFAIR की बात थी ... मतलब की सारा देश ठीक ठाक ही थी ......मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैंने जान क्यों दी .......मेरी पत्नी चुप हो गयी थी ..अब उसके आंसू नहीं आ रहे थे ...मेरा दोस्त बार बार रो देता था ....और ख़ुशी.....वो सबसे पूछ रही थी ,पापा को क्या हुआ ,कब उठेंगे , हमें खेलना है न.......................................