Monday, 4 May 2015

स्वयं से स्वयं तक स्वयं की प्रतीक्षा में

अपने विषय मे मुझे कोई मीठा भ्रम नही है। यों भी हिन्दी जगत में लेखकों और मेरे जैसे बेकार के प्राइवेट कर्मचारियों को अपने बारे में खुशफहमियाँ बुढापे मे ही होती हैं, जवानी में पैदा तो हो जाती हैं पर विकसित बुढ़ापे मे ही होती हैं।


ये भ्रम कि मैं हिंदी को दिशा प्रदान करने के लिए जन्मा हूँ, मेरे नाम से एक युग संबोधित होगा, सब पर छा जाउँगा आदी मुझे नही हैं, और न रहेंगे।


यह नम्रता नही सच है कि हिन्दी के वर्तमान ग्रुपफोटो मे मैं बिल्कुल पिछली पंक्ति में खड़ा हूँ, गरदन ऊँची कर दूसरों के कँधों के बीच कहीं झाँक रहा हूँ।


चित्र देखने वाले को मुझे जानना ज़रूरी नही है, मेरी कोई रचना ऐसी नही है जिसपे बात की जाए, फिलहाल मुझसे उम्मीद करना भी बेकार है।


इसका अर्थ यह बिल्कुल नही की मैं किसी हीन भावना से पीड़ित हूँ। जब मौका लगता है रौब मार लेता हूँ, प्रायः नयी स्कीमें गढ़ता हूँ, रोज कोई संकल्प लेता हूँ, पर वास्तविकता यह है कि मुझमे आलस और अक्षमता का ऐसा मधुर सम्मिश्रण कलात्मक अनुपात में हुआ है कि स्कीम तजना और संकल्प भुलाना मेरी आदत हो गयी है।


इधर कुछ वर्षों में मैनें लेखन को गंभीरता से लिया, कुछ छोटी मोटी रचनाएँ मैने लिखीं पर वह कोई खास नही है, मुझे खुद भी ज्याद पसंद नही है, मुझे ठीक से लिखना नही आता। मुझे न आलोंचको ने सम्मान दिया न रद्दी वालों ने, क्यूँ कि न मैने अच्छा लिखा न ज्यादा।


मेरे पास गलतफहमी मे जीने के कुछ कारण थे पर मैने उन्हे नहीं माना, जैसे मेरे पिता शिक्षक थे और भाई भी दिमाग का तेज था तो मुझे भी होना चाहिए। हमारे पुरे परिवार में शनि का कोई चक्कर तो था, माता जी मानती थीं पूजा पाठ करती रहती, कुण्डलियाँ दिखाती, पिताजी के स्वास्थ्य की और हम भाई बहन की भविष्य के चक्कर में।


हम कुल तीन भाई बहन हैं, सब एक दूसरे से प्रकृति में अलग हैं। छोटे थे तो मारपीट करते थे अब एक दूसरे को बेवकूफ समझते हैं। सबका अपना व्यक्तित्व, अपनी भाषा व अपना कार्यक्षेत्र है। मैं थोड़ा अक्खड़ था थोड़ा अलगाव वादि, इसलिए सड़कों पे घुमना और दोस्तों के यहाँ घुमना मेरा शगल बन गया था।


मेरे पिताजी ने मुझे सुधारने के लिए विशेष ध्यान दिया। उन दिनों पिताओं के पास बेंत रूपी जादुई छड़ी होती थी सुधारने के लिए। महिने में एक बार कम से कम बड़े पैमाने पर मेरे सुधार का धुआँधार समारोह होता था, कभी-२ रिश्तेदार भी मेरे पिता को खुश रखने के लिए मुझे पीट देते थे। विद्यालय में शिक्षकों को हमें पीटने के ही आधे पैसे मिलते थे कम से कम मुझे ऐसा ही लगता था, ऐसे शिक्षक की बड़ी प्रशंसा की जाती थी हमारे घर में।


आज सोचता हूँ कि अगर इतना किसी थाने या नारे लगाने के कारण कोतवाली में पिटा होता जितना घर या विद्यालय में पिटा हूँ तो नेता होता या सरकार से आवेदन करके ८-१० एकड़ जमीन अपने नाम करवा लेता।


मैं खोखलेपन व इज्जत नाम के दिखावटी राक्षस से दूर रहता हूँ, क्यूँकि मैनें बचपन से कोई २० वर्ष तक जब तक मैं अपनी उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ नही आ गया तब तक एक खुशहाल परिवार के अंदर से जर्जर होने की लंबी कहानी देखी है।

यह मध्यमवर्ग किस प्रकार अंदर से खोखला रह कर ऊपर से पॉलिश करता है टीवी का वाल्यूम बढ़ा कर बीवी से झगड़ा करता है, घर का चूल्हा सही से न जले खिड़कियों से हवन का धुआँ निकलना चाहिए, लड़के की शादी में रौला होना चाहिए। हमारी यहाँ ऐसी इज्जत है वहाँ वैसा सम्मान है, कोई जाने का तो क्या कहेगा।

ज्योतिषी पत्री देखकर बताते कि एक साल का कष्ट और फिर अगले वर्ष सब ठीक पर ऐसा साल कभी आता नही है। ऐसी संकीर्ण सोच और मध्यम वर्ग का सिर्फ दिखावटी सम्मान मुझे विचलित करता था।

इस दकियानुसी समाज में भुला देने की बात तभी शुरू हो गयी थी जब पिताजी कि इच्छा विरुद्ध मैनें सरकारी नौकरी न करने का प्रण किया, मुझे नही समझ आते दिखावटी सम्मान वाले लोग।


फिर अपना मैनेजमेंट का कोर्स करते हुए जाना कि यह समाज तो और दिखावटी और खुदगर्ज है तब मैने सीखा कि अपनी तकलीफ भुलाने का एक ही तरीका है कि समाज मे बहुत गहरे चले जाओ और भूल जाओ। भीड़ में रहो ताकि मन की वीरानी दूर हो, ठहाके लगाओ जिससे आँसू सूख जाएँ।

मेरी तीन आदतें हँसना, भटकना और लिखना इसी बीच पनपी।


फिर इसी बीच मैं एक प्राइवेट संस्था मे काम करने लगा वह भी वित्तीय विभाग मे कहने को, य़हाँ हमारी प्रेमिका बनी और कुछ आय का साधन भी फिर धीरे-२ आय बड़ी और कुछ घर पैसे बचा के भेजने लगा इसी बीच प्रेमिका छोड़ गई, खैर छोडिए यह कहानी वहाँ ज्यादा ताल्लुक नही रखती है।


दिल्ली मे रहकर समझ आ गया कि समाज सिर्फ दिखावटी ढकोंसलो से चल रहा है, तो हिन्दी में कुछ लिखना शुरू किया। तब समझ मे आया हिन्दी मे लिखना खुद अपना दर्जा गिराने जैसा रहा है, पिछले कुछ दशकों मे यह एक घटिया विद्या मानी जाती रही है। हमारे पढ़े समाज के लोग अँग्रेजी में पढ़ते हैं न!!


मैं हमेशा से ईमानदार रहना चाहता हूँ, यश, सुविधा सब खोकर भी, मगर ईमानदारी इस समाज में किसी जिद से नही आती, वह भी सच्चाई जानने के बाद निश्चित की जाती है, इसलिए मुझे लगता है मेरी मूर्खता भरी यात्रा लंबी है।


अभी तक जो मेरा मन आया वह नही लिख पाया या यह कहूँ व्यक्त नही कर पाया, मेरे अनुभव व अनुभूत कड़वाहटें, वह एक सकल पूँजी डिपाजिट पड़ी है। उसे व्यक्त कर पाऊँ तो कुछ संतोष होगा। इधर जिंदगी मे कुछ ठहराव है, उससे उभरना है। कल को शव भी तो छोड़ना है बोझ लेकर कहाँ जाऊँगा।।


उपरोक्त बातें केवल मेरे व्यक्तिगत जीवन या लेखन से शायद न भी जुड़ी हों, इनमें अगर कुछ आपको अन्यत्र मिलता है तो आप गाली देने के लिए स्वतंत्र हैं ......!!

आपकी अपनी राय है....!!

10 comments:

  1. सामाजिक ढकोसलों के तानो बानो को तोड़ने की एक जिजीविषा, और उससे मुक्त होने की चेष्टा, जिंदगी का सफ़र अपने कदमों पर तय करने का एक बुलंद इरादा और सबसे उपर भीड़ में अपनी पहचान को कायम रख पाने की कशमकश..! सारे रंग निचोड़ कर रख दिए है भाई आपने| बहुत खूब दर्शाई है अपनी आत्म व्यथा| साधुवाद... इसी तरह अच्छा लिखते हुए हिन्दी की सेवा करते रहो यही आशीर्वाद|

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  2. धन्यवाद है आपका, आपने समझा इसे मैनें देखा है इसमें से कई प्रसंग हर मनुष्य के जीवन में होते हैं। आभार और आपका आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ूँगा और लिखूंगा समय के अन्त छोर तक...सदैव

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    1. धन्यवाद आपका हृदय से....!!

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  4. Bahout gehraayi hai inn baaton mei. Ittni sachayi kehna sabki bas ki baat nahi. Bhout khoob.

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  5. अभी तक जो मेरा मन आया वह नही लिख पाया या यह कहूँ व्यक्त नही कर पाया, मेरे अनुभव व अनुभूत कड़वाहटें, वह एक सकल पूँजी डिपाजिट पड़ी है।
    सच लिख दिया है फिर भी लगता है कि जीवन का अधूरा सच है...

    आपका प्रोत्साहन अविश्वसनीय है, मेरे दिल की गहराई से धन्यवाद.....!!

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  6. एक ही बात कहूँगा निचोड़ देते है आप अपने इस छोटे से जीवन के बड़े बड़े अनुभवों को

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  7. स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जाना कठिन है फिर भी नई चुनौतियों में ही भविष्य का पहिया अपनी दिशा तलाशता है । सफलता असफलता तो देखने वाले के नज़रिए में होती है । इतिहास साक्षी है कि कितनी दुर्गम परिस्थितियों में भी जीवन धारा अविरल रही है ऐसे में आपका प्रयास मुक्त कण्ठ से प्रशंसनीय है बन्धु ।
    शुभकामनाएं

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    1. अशुंमान मित्र ये आज से लगभग दो साल पहले लिखा था, जितना मै अपने आप को जान सका हूँ, आपकी प्रसंशा के हृदय से धन्यवाद...!!

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