Sunday, 27 December 2015

मेरे देश की अंर्तकैद की कथा

उठो! ओ मेरे भारतीयों


अपनी चमड़ी के आहत गुलाब के लिए उठो

उठो ओ मेरे देशवासियों

अपनी रात की रानी की नोंची गई हरेक पंखुड़ी के लिए उठो

उठो देश के हर कीचड़ भरे गड्ढे के लिए

कि वह तूफ़ानी वसंत के बवंडरों से तुम्हारे पद चिह्नों को सोख सके

कि बिखरे खून की चमक मिटाने का साहस कोई न करे

अपनी जनता की भरी-पूरी खुशहाली ओढ़ 

जा मेरे देश!

विश्व की उम्मीदों पर सवार हो

और तू लौट प्रबुद्ध हो कर

मिलाए गए सभी हाथों से

सभी पढ़ी गई किताबों से

बाँट कर खाई गई रोटियों से

उन सभी दिनों से जिन्हें जोता होगा तूने

कि मानवता का सुनहरा अनाज उपज सके।
:~ रोहित पाठक

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