श्रीमद् भागवत गीता का अनुसरण क्यूँ करना चाहिए।
नीचे लिखे लेख से पहले एक बात यथार्थ रूप से समझ लें कि अगर लेख शुरू करें तो पूरा पढ़ें, अन्यथा आप मुझे निरर्थक ही गाली देंगे क्या लिख रहा है, वैसे लोकतंत्र मे आप स्वतंत्र है ऐसा करने के लिए।
आपने Objectve और Subjective के बारे में सुना तो जरूर होगा ? आजकल कई प्रतियोगिता परीक्षाओं में Objective सवाल किये जाते हैं, Subjective का दौर ख़त्म सा हो चला है | शायद यही कारण है कि आज लोगों को वस्तुनिष्ठ सत्य (Objective truth) तो समझ आता है मगर व्यक्तिनिष्ठ सत्य (Subjective truth) समझ नहीं आता |इसे समझने-समझाने के लिए एक आसान सा, जाकिर नाइक वाला सवाल देखिये, जिसमें वो कहता है 2 + 2 = 4 | आप किसी से भी पूछेंगे की दो जमा दो कितने होते हैं तो जवाब चार ही आएगा |
ये वस्तुनिष्ठ सत्य है, Objective truth, जो कभी नहीं बदल रहा | अब एक दूसरा सवाल कीजिये, पूछिए, ‘आपके पिताजी का नाम क्या है ?’ | इस सवाल का जो जवाब आप देंगे, वही जवाब आपकी पत्नी देगी क्या ? आपका पड़ोसी वही जवाब देगा ? नहीं ना ! मतलब या तो सच सबके लिए अलग है या लोग झूठ बोल रहे हैं ? ये दरअसल व्यक्तिनिष्ठ सत्य है, यानि Subjective truth, इसका जवाब बदल सकता है | कोई झूठ भी नहीं बोल रहा, और दो लोग एक ही नतीजे पर पहुंचें ये जरूरी भी नहीं |
इसी को समझाने के लिए पुराणों में एक कार्तिकेय का किस्सा आता है | वो शिव-पार्वती के पुत्र थे, दक्षिण-भारत में कार्तिकेय को ‘अरुमुगा’ या छह चेहरों वाले देवता की तरह देखा जाता है | वह एक अद्भुत क्षमता वाले इंसान थे, जो की छोटी उम्र में ही अजेय योद्धा बन गए थे।कार्तिकेय को अपने वाहन, मोर, पर बहुत गर्व था । गणेश जी का छोटा सा पिद्दी सा चूहा, कहीं से मोर का मुकाबला नहीं कर सकता था | दोनों में इसी बात पर बहस छिड़ गई | फिर उन्होंने आपस में एक प्रतियोगिता करने का फैसला किया कि कौन सबसे तेजी से दुनिया का चक्कर लगा सकता है | जो भी जीत के पहले लौटेगा, उसे मां-बाप से एक खास तरह का आम मिलेगा ।प्रतियोगिता शुरू हुई । कार्तिकेय अपने मोर पर उड़ चले । उन्होंने पूरी दुनिया का चक्कर लगाया मगर जब वह लौटे तो देखकर हैरान रह गए कि गणपति वहीं बैठे थे । उन्हें ईनाम भी मिल चुका था ! कार्तिकेय क्रोधित हो गए । उन्होंने अपने माता-पिता से पूछा, ‘यह कैसे संभव है? मैं दुनिया का चक्कर लगा आया, जबकि इसने अभी चक्कर लगाना शुरू भी नहीं किया । फिर आपने इसे आम कैसे दिया ?’ दरअसल गणपति ने शिव और पार्वती के तीन चक्कर लगा लिए थे । गणपति बोले, ‘मेरे लिए, मेरी पूरी दुनिया माता-पिता ही हैं । इसलिए मैंने माँ-बाप के तीन चक्कर लगाए और इस हिसाब से दुनियां के तीन चक्कर लगा लिए ।’ भगवान शिव ने चीजों को वास्तविक रूप में समझने की गणपति की विशेषता को देखकर आम, छोटे बेटे गणेश को दे दिया था |मगर कार्तिकेय को यह एक बड़ा अन्याय लगा, इसलिए वह इसे लेकर बहुत गुस्से में थे । पार्वती ने उन्हें समझाने की कोशिश की, कि कुछ चीजें ‘वस्तुपरक’(objective) और कुछ ‘व्यक्तिपरक’(subjective) होती हैं | सभी अनुभव व्यक्तिपरक होते हैं । वस्तुएं सिर्फ व्यक्तिपरक अनुभव पैदा करने के लिए होती हैं । अपने आप में उनकी कोई अहमियत नहीं है । इसलिए गणपति ने बस अपने माता-पिता का चक्कर लगाया क्योंकि उनके अंदर यह समझदारी थी कि ‘मेरे माता-पिता मेरी दुनिया हैं, इसलिए मैं उनके ही चक्कर लगा लेता हूं ।’माता-पिता हों ही नहीं तो बच्चा किसका ? या फिर बच्चे के बिना माता-पिता कोई कैसे हो सकते हैं ? इसलिए ये अपने आप में कोई अहमियत रखने वाला दर्ज़ा नहीं है | उन्हें चाहो तो पूरी दुनियां मानो, ना चाहो तो कुछ भी नहीं ! मगर कार्तिकेय को अपनी मां की कोई बात समझ नहीं आई और उन्होंने घर छोड़ दिया ।यही कारण है कि वो ज्यादातर शिव-पार्वती से दूर ही रहे | माना जाता है कि वो अगस्त ऋषि की मदद करने उनके साथ दक्षिण की ओर चले गए थे | अभी भी भारत में उनके मंदिर ज्यादातर दक्षिण भारत में ही पाए जाते हैं |अभी के समय में भी आप इस Objective और Subjective Truth की खींच-तान देख सकते हैं |
अक्सर इतिहास (चाणक्य, रानी लक्ष्मीबाई), साहित्य (पंचतंत्र, हितोपदेश, रामचरितमानस) और मिथकों (रामायण, बाइबिल) में अंतर स्पष्ट नहीं होता | मिथक दरअसल Subjective यानी कि व्यक्तिनिष्ठ, या व्यक्तिपरक सत्य को देखने समझने के प्राचीन समुदायों के तरीके होते हैं | इसमें ये समुदाय कहानियों का इस्तेमाल करते हैं, रूपक या symbol इस्तेमाल करते हैं | कई रीति-रिवाज या विधि-विधान भी उसके ही तरीके हैं |अगर इतिहास और साहित्य ऐसे ही व्यक्तिपरक सत्य को समझाने के तरीके हों तो उन्हें भी मिथक ही मान लिया जाता है | जैसे कि मौर्यों की वंशावली तो पुराणों को इतिहास मान के ली जाएगी लेकिन फिर भी उन्हें मिथक ही माना जायेगा | वस्तुपरक सत्य किन्ही “बुद्धिजीवियों” की समझदारी पर निर्भर हैं | उसके लिए वैज्ञानिक चाहिए, कोई नबी चाहिए, कोई चर्च चाहिए, बड़े-बुजुर्गों का कहा चाहिए | किसी न किसी ‘ज्ञानी’ की सत्ता जरूरी है, वो व्यक्तिगत सत्यों को नकार के ही स्थापित होगी |वस्तुपरक सत्य इकलौता होता है, मगर व्यक्तिपरक सत्य के अनेकों रूप होंगे | ये भागवतगीता जैसा है, To each his own ! आप जितनी बार देखेंगे इसका स्वरुप बदलता दिख सकता है | इसकी स्थापना के लिए वाद-विवाद या शास्त्रार्थ या तर्कों की आवश्यकता नहीं होती | मेरा सत्य किसी और के सत्य को ख़त्म नहीं कर देता | सांख्य दर्शन है, तो अद्वैत भी है, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, या द्वैत भी है | ये संवाद की स्थिति है, जहाँ मैं अपने ही सत्य को किसी और के दृष्टिकोण से, एक सर्वथा नए रूप में देख लेता हूँ |भारत में स्मृति परंपरा के साथ साथ श्रुति परंपरा के होने का ये भी एक कारण रहा है | स्मृतियाँ जहाँ ज्यादातर न्याय अथवा व्याकरण के कठोर ना बदलने वाले नियमों पर लागू होती थी वहीँ श्रुति परम्पराएँ रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों पर लागू हुई ।
आज भी आपको रामायण किसी वाल्मीकि की किताब से याद नहीं है, आपको वो याद है जो आपने कभी अपने दादा-दादी या फिर नाना-नानी की गोद में बैठकर सुना था |यहाँ आपका ध्यान इसपर भी चला जायेगा कि मिथक हमेशा धर्मों से ही सम्बन्ध नहीं रखते | कई बार ये किसी नायक का महात्म्य भी होते हैं | जैसे हमारा रामायण जो हमें सुनने से पता था वो राम का महात्म्य था | उत्तर रामायण के सीता के धरती में समाने, वन-गमन, जैसे हिस्से कितने लोगों ने सचमुच वाल्मीकि के लिखे में पढ़ा है ? राम के महात्म्य से आगे इस ग्रन्थ में धर्म कहाँ है ? राम को हटा लें तो रामायण में धर्म रहेगा कहाँ ?सत्य को पूर्ण रूप से जानने का दावा भी कोई मनुष्य नहीं करता | ज्यादा से ज्यादा किन्ही ज्ञानियों के लिखे या कहे के आधार पर आप उसे मान लेते हैं | यानि आप वस्तुपरक सत्य(objective truth), पर ही अटके हैं | व्यक्तिपरक, Subjective, आपके खुद के, अपने सत्य पर तो ध्यान भी नहीं गया आपका !ये एक जन्म और पुनर्जन्म के सिद्धांतों का भी कारण है | एक जन्म में ही सत्य को जान लेने या पा लेने की चाह बेचैनी बढ़ा देती है | वहीँ जिनका कई जन्मों में विश्वास है वो एक एक सीढ़ी आगे जाने की सोच में थोड़ी शांति में जीते हैं |
जैसा कि आप पहले से जानते हैं, कला, संस्कृति, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान किसी सभ्यता में, शांति के बिना तो पनप नहीं सकते ना ?आधुनिक शिक्षा जहाँ एक ही जीवन के ‘मिथक’ को मानती है, वहीँ कई प्राचीन परम्पराएँ कई जन्मों और कर्मफल जैसे ‘मिथकीय सिद्धांतों’ में विश्वास रखती है | ग्रीक परम्पराएँ, बाइबिल या पुराने इजिप्ट के मिथक एक जीवन और अनंत काल के स्वर्ग-नर्क की धारणा रखती है | भारत के मिथक इन दोनों को जोड़ते हैं | इसमें कर्म के अदृश्य ‘बीज’ होते हैं जो, पेड़ों और फलों के रूप में दृश्य हो जाते हैं | जैन परम्पराओं में भी देखेंगे तो वसुदेव एक ग्रीक नायक की तरह हैं | जैसे ट्रॉय के युद्ध में सबको एक ही जीवन में कुछ अनोखा कर गुजरना था वैसे ही वो भी हैं | वहीँ चक्रवर्ती बाइबिल के किसी राजा जैसे हैं, जिन्हें जीवन के बाद उत्तम फलों की प्राप्ति होगी, तीर्थंकर इन दोनों के मिले जुले स्वरुप हैं |
उनके लिए जीवन के महत्त कार्य भी हैं, बाद के उत्तम फल भी !भारत के दर्शन में सांख्य ऐसे ही अन्वेषणों और शोध की प्रक्रिया है | योग प्रकृति से पुरुष के जुड़ने, यानि दो के एक हो जाने के तरीकों का जिक्र भर है | किसी भी देवी देवता कि कहानी हो, चाहे शिव-पार्वती हों, या फिर सीता-राम, वो आपकी दुनियां से आपके सम्बन्ध की कहानी है | आप जुड़ते भी हैं दूर भी जाते हैं, सम्बन्ध बदलते भी हैं, नए सिरे से फिर जुड़ते भी हैं | लिंग का भेद, स्त्री-पुरुष का फर्क भी नहीं है | आम तौर पर जिस भगवतगीता के सख्त से कृष्ण को आप जानते हैं वो हर जगह वैसे ही नहीं है | मराठी में ज्ञानेश्वरी लिखी गई है | सख्ती से अर्जुन को समझाते पौरुष वाले गुणों से युक्त कृष्ण वहां मातृत्व के गुणों वाले स्त्रैण विथाई भी हो जाते हैं |इन सारे कारणों से वस्तुपरक (Objective) और व्यक्तिपरक (Subjective) दोनों ही सत्यों को ध्यान में रखना जरूरी होता है | कई बार आपकी मुलाकात ऐसे लोगों से होगी जो अपने सत्य के अलावा बाकी सबके सत्य को असत्य घोषित करते रहते हैं | कोई आपको झूठा कह जाए तो परेशानी भी होती होगी |
"ऐसे सवालों से खुद ही निपटने के लिए भगवतगीता पढ़नी चाहिए ।"
जहाँ कई ग्रन्थ, To be or not to be, पर ख़त्म होते हैं, भगवत गीता वहीँ शुरू होती है |बाकी जिन्हें वस्तुपरक और व्यक्तिपरक सत्य का अंतर ना समझ में आता हो, उनसे उनके पिताजी का नाम जरूर पूछिए |
आशा है वो भी समझ जायेंगे |
#Random_Musings_on_Bhagwat_Gita 9
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