‘योग’ कि ‘योगा’? उच्चारण दोष क्यों ?
व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में बोली जाने वाली किसी भी भाषा में उच्चारण की एकरूपता का अभाव एक सामान्य बात है । अंग्रेजी को ही यदि हम लें तो पायेंगे कि उत्तरी अमेरिका की अंग्रेजी आस्ट्रेलिया की अंग्रेजी से उच्चारण में स्पष्टतः भिन्न रहती है, और दोनों ही ब्रिटिश अंग्रेजी से सर्वथा अलग ठहरती हैं । स्वयं ब्रिटेन में सर्वत्र समान उच्चारण की अंग्रेजी का अभाव मिलता है । तदनुसार स्काटलैंड तथा वेल्स की अंग्रेजी तथा ‘लंडनर्स’ की अंग्रेजी (जिसे मानक के तौर पर स्वीकारा गया है) में काफी अंतर दीखता है । यही हाल चीनी भाषा का भी है । चीन के उत्तरी क्षेत्र से दक्षिणी क्षेत्र तक एक ही लहजे और घ्वनियों की भाषा नहीं बोली जाती है । एक बार मेरी भेंट अमेरिका में एक चीनी युवक से हुयी थी, जो मूलतः ताइवान (रिपब्लिक आव् चाइना) का रहने वाला था और अमेरिका में वह ‘कंडक्टेड टुअर’ के ‘गाइड’ का कार्य करता था । उसका अंग्रेजी-उच्चारण अच्छे स्तर का नहीं था । बातों-बातों में उसने बताया था कि उसे चीन (पीपुल्स रिपब्लिक आव् चाइना) के उत्तरी क्षेत्र की बोली समझने में दिक्कत होती है । संयोग से मानक चीनी भाषा (चाइनीज मैंडरिन) की खूबी यह है कि इसकी लिपि सर्वत्र एक है । अतः लिखित तौर पर पूरे चीन में यह बखूबी पढ़ी तथा समझी जा सकती है और यही चीन के लिए लाभ की बात रही है । अन्यथा उच्चारित रूप में वहां भी लोगों को अड़चनें रहती हैं ।
वस्तुतः कोई भाषा किसी क्षेत्र में कैसे बोली जाती है यह वहां की भौगोलिक परिस्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक विरासत जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है । यही कारण है हमारी हिन्दी सर्वत्र एक जैसी नहीं बोली जाती है । इस प्रकार देखा जा सकता है कि हरियाणा में बोली जाने वाली हिन्दी वही नहीं रहती जैसी आंध्र के हैदराबाद में अथवा बिहार के पटना में । संयोग से व्याकरण के नियमों के कारण लिखित हिन्दी कमोबेश सभी जगह एकसमान रहती है । उच्चारण भेद को हम एक दोष के रूप में न देख उस भाषा की स्थानीय विशिष्टता के तौर पर स्वीकार सकते हैं । यह समझना कठिन नहीं है कि क्षेत्रविशेष के सभी मूल निवासी स्वाभाविक तौर पर उसी उच्चारण के आदी होते हैं । हां, पढ़े-लिखे लोग परिष्कृत तथा मानक हिन्दी का आवश्यकतानुसार प्रयोग भी करते देखे जाते हैं ।
परंतु कभी-कभी नितांत अनुचित कारणों से, यथा लोगों की लापरवाही से, उच्चारण में कुछ नये प्रकार के प्रयोग देखने को मिलने लगते हैं जिसे एक दोष के तौर पर माना जाना चाहिए । हिन्दीभाषियों के उच्चारण में ऐसा दोष मैं उनके विदेशों से आयातित उच्चारण में देखता हूं । क्या है यह दोष ?
यह दोष है ‘योग’ शब्द का उच्चारण ‘योगा’ करना और फिर उसके अनुरूप शब्द को ही ‘योगा’ लिख देना । वस्तुतः ऐसे अनेकों उदाहरण उपलब्ध हैं । विचार करने पर मैंने अनुभव किया कि यह शब्द भारतीय योगविद्या के पाश्चात्य जगत् को निर्यात और फिर उसके ‘इंग्लिशीकृत’ तथा ‘परिष्कृत’ संस्करण के आयात के साथ ही यह शब्द हमारे पास पहुंचा है । हम भारतीयों की योगविद्या में रुचि बहुत पहले ही समाप्तप्राय हो चुकी थी । यह तो पाश्चात्य जिज्ञासुओं की योगविद्या पर कृपा हुयी कि उन्होंने उसके न केवल लाभों को स्वीकारा अपितु उसे ‘परिष्कृत’ नाम ‘योगा’ के साथ इस देश को भेंट किया । चूंकि हम भारतीय (वस्तुतः इंडियन) आज भी गुलाम मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके हैं, अतः देश की मौलिक भाषाओं में रुचि खो चुके पढ़े-लिखे लोगों ने जब यूरोप-अमेरिका के नागरिकों के मुख से ‘योगा’ की ध्वनि सुनी होगी तो उन्हें तुरंत विचार आया होगा कि शब्द ‘योग’ के उच्चारण में तो सुधार होना ही चाहिए और साथ ही उसकी वर्तनी (स्पेलिंग्) का भी ‘संस्कार’ किया जाना चाहिए । मैं उच्चारण के साथ वर्तनी की बात इसलिए कर रहा हूं कि मैंने लोगों के मुख से ‘योगा’ ही नहीं सुन रखा है, बल्कि कई स्थलों पर ‘योगा’ लिखा हुआ भी देखा है । कुल मिलाकर ‘योगा’ कहा और लिखा जाना चाहिए, क्योंकि यह यूरोप-अमेरिका के लोगों के उच्चारण पर आधारित है!!
क्या ‘योगा’ उच्चारण दोषपूर्ण नहीं है ? वे लोग जो बेझिझक इस उच्चारण के साथ बात करते हैं उन्हें इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि उन तमाम शब्दों का क्या होगा जो ‘योग’ के आगे उपयुक्त उपसर्ग (प्रीफिक्स) लगाने से प्राप्त होते हैं, यथा अभियोग, आयोग, उद्योग, उपयोग, दुर्योग, नियोग, प्रयोग, वियोग, संयोग, एवं सुयोग आदि । ‘संयोग’ से मैंने लोगों के मुख से अभी ‘उद्योगा’, ‘उपयोगा’ तथा ‘प्रयोगा’ नहीं सुना है । ये शब्द आम बोलचाल में अक्सर प्रयुक्त होते हैं । चूंकि ये शब्द विदेशियों के मुख से शायद ही कभी सुनने को मिलते हैं, अतः इनका उच्चारण हम पारंपरिक तरीके से ही करते हैं । पर जरा सोचिये कि जब ‘योग’ को ‘योगा’ उच्चारित किया जाये तो ‘प्रयोग’ को क्यों न ‘प्रयोगा’ बोला जाये ?
अकारांत शब्दों (जिनका अंत ‘अ’ स्वर ध्वनि के साथ हो) को आकारांत बनाकर बोलने-लिखने की बात केवल ‘योग’ तक सीमित नहीं है । अनेकों ऐसे शब्द हैं जो उच्चारण की दृष्टि से प्रदूषित हो चुके हैं, जैसे ‘अशोका’, ‘कृष्णा’, ‘बुद्धा,, ‘मोक्षा’, ‘रामा’, तथा ‘हिमालया’ आदि । टेलीविजन चैनलों पर मैंने “जब सूर्या मेषा राशि में इंटर करता है ।” जैसे कथनों को भारतीय पद्धति के भविष्यवक्ताओं के मुख से सुना है ।
उच्चारण वास्तव में दोषपूर्ण है इसे समझने के लिए इस सवाल पर मनन करें: क्या यूरोप के अंग्रेजी-भाषी लोग वास्तव में चर्चागत शब्द का उच्चारण ‘योगा’ ही करते होंगे ? प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैंने मानक अंग्रेजी शब्दकोशों का सहारा लिया । मैंने पाया कि ‘योग’ (जिसे yoga लिखा जाता है) के उच्चारण में अ की वही स्वरध्वनि सुनने को मिलती है जो अंग्रेजी के about तथा urgent में प्रथम और nation तथा local में द्वितीय स्वर ध्वनि में है । यह ध्वनि calm, fast, far, तथा ask आदि में विद्यमान आ से सर्वथा भिन्न है । अवश्य ही एक अंग्रेज भी ‘योगा’ नहीं बोलता है । हो सकता है कि हलंत सुनने के आदी हिंदीभाषियों को अ और आ में भेद अनुभव न होता हो ।
यहां पर मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरी समझ में संस्कृत पूर्णतः ध्वन्यात्मक भाषा है, अर्थात् उसके लिपिचिह्नों (देवनागरी) एवं उच्चारित ध्वनियों के बीच एक-का-एक-से का अनन्य संबंध है । तदनुसार संस्कृत में जैसा लिखा जायेगा वैसा बोला जायेगा और जो बोला जा रहा हो वही लिखा जायेगा । लिखित चिह्नों तथा उच्चारित ध्वनियों के मध्य जो असंदिग्ध संबंध संस्कृत में विद्यमान है वह शायद किसी भी अन्य भाषा में नहीं उपलब्ध है ।
अधिकांश भारतीय भाषाओं (दो-तीन भाषाओं को छोड़कर जैसे तमिल तथा सिंधी) की वर्णमाला कमोबेश संस्कृत वाली ही है, भले ही उनमें दो-एक अतिरिक्त वर्ण घटा बढ़ा दिये गये हों, जैसे हिंदी में ड़ ढ़ तथा मराठी में ळ, आदि । अवश्य ही उनकी लिपियों में परस्पर भेद दिखता है । यह भेद बहुत गंभीर नहीं है, क्योंकि प्रायः सबका आधार प्राचीन ब्राह्मी लिपि रही है । परंतु इन भारतीय भाषाओं में उच्चारण की दृष्टि से वह शुद्धता देखने को नहीं मिलती है जो संस्कृत की विशिष्टता है । प्रायः सभी भाषाओं में उच्चारण संबंधी विकार उनके स्वरूप का स्थायी अंग बन चुके हैं । उदाहरणार्थ बांगला में ब तथा व, और ण तथा न में उच्चारण भेद देखने को नहीं मिलता है । इस प्रकार के विकार भाषाओं में स्थापित हो चुके हैं और उनकी विशिष्टता बन चुके हैं । किंतु ‘योग’ का ‘योगा’ उच्चारण इस प्रकार के विकारों में शामिल नहीं है और न ही इस विकार को स्वीकारे जाने की कोई आवश्यकता है ।
उच्चारण संबंधी एक विकार बोलचाल की हिंदी का हिस्सा बन चुका है और जिसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है । यह विकार है अकारांत पदों का उच्चारण हलंत पदों की तरह किया जाना । इस प्रकार ‘कल’ का उच्चारण वैसे ही किया जाता है जैसे ‘कल्’ का (अर्थात् क्+अ+ल्) । इस पद के अंत का अकार अनुच्चारित ही रह जाता है, और यह ध्वनि ‘कला’ के अंत में विद्यमान आ की ध्वनि से स्पष्टतः भिन्न रहती है । हिंदी के इस प्रतिष्ठापित विकार के अनुसार ‘योग’ का उच्चारण ‘योग्’ जैसा होने पर कुछ भी अजूबा नहीं, किंतु ‘योगा’ जैसा तो अस्वीकार्य ही है । अकारांत कुछ पदों की ध्वनि कभी-कभी स्पष्ट सुनाई पड़ती है, भले ही वह अत्यल्पकालिक ही हो, जैसे ‘अन्त’, ‘पक्व’ तथा ‘अल्प’ आदि में ।
हिंदी के विपरीत संस्कृत में हलंत तथा अकारांत पदों के उच्चारणों में भेद स्पष्ट रहता है । इस प्रकार ‘कल’ के उच्चारण में पदांत अ ध्वनि विद्यमान रहती है (उच्चारण – क्+अ+ल्+अ) और यह आ की घ्वनि की तुलना में अल्पकालिक रहती है । ध्यान रहे कि अ ह्रस्व है और आ दीर्घ । दिलचस्प है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के बोलने वाले अकारांत पदों को हलंत उच्चारित नहीं करते हैं । वे वैसा ही उच्चारण करते हैं जैसा संस्कृत में । यह अंतर हिंदीभाषियों और कन्नड़भाषियों के संस्कृत बोलने में भी नजर आता है । कन्नड़भाषी ‘योग’ को वस्तुतः ‘य्+ओ+ग्+अ’ ही बोलता है जो हिंदीभाषियों को कदाचित् आकारांत लगता हो । इस दृष्टि से हिंदीभाषियों का संस्कृत उच्चारण स्तरीय नहीं माना जा सकता है । अब कुछ दक्षिण भारतीय भी ‘योगा’ बोलने लगे हों तो आश्चर्य नहीं होगा ।
हिंदीभाषियों के उच्चारण में अ का लोप अकारांत पदों तक ही सीमित नहीं है । पदों के अंदर भी ऐसा विकार अक्सर दिखाई पड़ता है । उदाहरणार्थ कई लोगों को गलती, जनता, छिपकली आदि शब्दों को क्रमशः गल्ती, जन्ता, छिप्कली आदि उच्चारित करते हुए सुना जा सकता है । अकार का यह विलोपन अभी कदाचित् स्वीकार्य नहीं है ।
कहने का तात्पर्य यह है कि ‘योग’ को ‘योग्’ और ‘राम’ को ‘राम्’ की भांति उच्चारित करना हिन्दी की विशिष्टता मानकर स्वीकारा जा सकता है । किंतु ‘राम’ को ‘रामा’ बोलना उतना ही हास्यास्पद माना जायेगा जितना ‘रम’ को ‘रमा’ बोलना । क्या ‘योग’ की तर्ज पर हम ‘भोग’, ‘रोग’, ‘ठग’, ‘शक’, एवं ‘काक’ इत्यादि का उच्चारण क्रमशः ‘भोगा’, ‘रोगा’, ‘ठगा’, ‘शका’, एवं ‘काका’ करना आरंभ कर देना चाहिए ? यदि नहीं, तो ‘योगा’ ‘रामा’ आदि के लिए इतना उत्साह क्यों है ? क्या इस प्रकार की मानसिकता पाश्चात्य लोगों के सापेक्ष हमारी हीनभावना का परिणाम तो नहीं ? सोचें ।
itna gyan late kaha se ho 😂
ReplyDeleteबस किताबें पढ़ो लोगों से मिलो, शब्द आ जाएँगे, ज्ञान जैसी कोई बात ही नही है...!!
Delete