मेरे एक मित्र बोले पाठक कुछ मदिरा पे लिखो, मैने सोचा ये तो अत्यंत कठिन है, फिलहाल न तो मैं "हरिवंश राय बच्चन" हूँ, और न ही मेरी औकात है मधुशाला जैसा कुछ लिख पाने की।
पर हमेशा की तरह मेरा घमंडी स्वभाव आड़े आ गया कहा नही पाठक बेटा लिखना तो पड़ेगा नही तो स्वाभिमान कहाँ ढूंढेगा, बड़ा आया कविता लिखता हूँ, ब्लाग लिखता हूँ, फलाना ढिमकाना।
बस उसी कारण कुछ अलल्म गल्लम जो मन में आया लिख दिया अब बस प्रतीक्षा है, कि उन मित्र को पसंद आ जाए..
ये रहीं कुछ पंक्तियाँ मेरे अनुसार मदिरा के लिए...
मैं इसे ठंडी बर्फ और
सुन्दर गिलास मे रखता हूँ
एक समय के एहसास के लिए
पर यह दे जाती है यादें!
कह ही जाती है हर बार
मैं तुमसे विमुख नहीं
न तुम मुझसे हो!!
लेकिन एक परछाँई है अपराध की
लोगों की नजर में
जो
हमारे विकसनशील संबंधों पर मँडराती है!!
मदिरा के संकल्प
हमारे संकल्पों से कम वेगवान नहीं हैं
उसकी सत्ता भी तो
हमारे ही रूपाकार में व्यक्त है, सत्य है!
यह भी ऐसा मानती है!! है न??
कभी-कभी तो
पीछा करने लगता हूँ
कि ठीक-ठीक कहाँ से बरसता है
मदिरा रस
गिलास की चमक से या
गर्म-ठंडी बर्फ से,
किसी के खिले हुए होंठों से या
प्रेयसी की खुली उजली बातों से।
इसके रंगों भरे पारदर्शी प्रेम में
जाग रहा हूँ मैं।
अपनी गहरी आकांक्षाओं से
विकल हूँ।
पर हमेशा की तरह मेरा घमंडी स्वभाव आड़े आ गया कहा नही पाठक बेटा लिखना तो पड़ेगा नही तो स्वाभिमान कहाँ ढूंढेगा, बड़ा आया कविता लिखता हूँ, ब्लाग लिखता हूँ, फलाना ढिमकाना।
बस उसी कारण कुछ अलल्म गल्लम जो मन में आया लिख दिया अब बस प्रतीक्षा है, कि उन मित्र को पसंद आ जाए..
ये रहीं कुछ पंक्तियाँ मेरे अनुसार मदिरा के लिए...
मैं इसे ठंडी बर्फ और
सुन्दर गिलास मे रखता हूँ
एक समय के एहसास के लिए
पर यह दे जाती है यादें!
कह ही जाती है हर बार
मैं तुमसे विमुख नहीं
न तुम मुझसे हो!!
लेकिन एक परछाँई है अपराध की
लोगों की नजर में
जो
हमारे विकसनशील संबंधों पर मँडराती है!!
मदिरा के संकल्प
हमारे संकल्पों से कम वेगवान नहीं हैं
उसकी सत्ता भी तो
हमारे ही रूपाकार में व्यक्त है, सत्य है!
यह भी ऐसा मानती है!! है न??
कभी-कभी तो
पीछा करने लगता हूँ
कि ठीक-ठीक कहाँ से बरसता है
मदिरा रस
गिलास की चमक से या
गर्म-ठंडी बर्फ से,
किसी के खिले हुए होंठों से या
प्रेयसी की खुली उजली बातों से।
इसके रंगों भरे पारदर्शी प्रेम में
जाग रहा हूँ मैं।
अपनी गहरी आकांक्षाओं से
विकल हूँ।
भाई शब्दों को उकेरना कोई आप से सीखे
ReplyDeleteएक और जाम आपकी इस कविता के नाम
मेरे दिल की गहराई से धन्यवाद भाई, आप अपने पेय का आनंद ले। किसी दिन, कहीं न कहीं हम आपके मदिरा और मेरी कविता का आनंद लेंगे।
Deleteबहुत ही उम्दा बधाई हो
ReplyDeleteमेरे दिल की गहराई से धन्यवाद.....
Deleteसुन्दर वर्णन , आपकी "औक़ात " का आंकलन भाई पाठकों पर छोड़े 👍👍🌹🌹
ReplyDeleteआपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, लोग मुझे पता है कि मुझे प्यार करते हो ...
DeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeletemaine wo kavita "jo beet gayi so baat gyi" school mei gaayi thi. Bahut uttam kavita thi. Bahut din k baad koi kavita "madiralaya k aanan" k baare mei likhi gyi hai. Atti Uttam!
ReplyDeleteन तो मैं "हरिवंश राय बच्चन" हूँ, और न ही मेरी औकात है मधुशाला जैसा कुछ लिख पाने की।
Deleteये तो एक मित्र की जिद थी पाठक तु शराब पे क्यूँ नही लिखता, अब ये कहाँ लिखा है कि मदिरा लिखने के लुए मदिरा सेवन आवश्यक है,
Thanks!! for your almighty reaction and encouragement.