मेघ पहली बार जब झरे,
वृक्ष सब निखर - निखर गए .…!
रूपसी पे रूप आ गया,
आईने संवर-संवर गए…..!!
वृक्ष सब निखर - निखर गए .…!
रूपसी पे रूप आ गया,
आईने संवर-संवर गए…..!!
धूप का कहर भी कम हुआ,
हवाएं कुछ विनम्र हो गईं….!
अल्पकाल के लिए सही,
शांति का बीज़ बो गईं…….!!
चाहतों के द्वार खुल गए,
हम निकल जिधर - जिधर गए …!
रूपसी का रूप देखकर ….!
आईने संवर-संवर गए…..!!
"सावन में जब पहली वर्षा होती है तो मन और देह पर क्या प्रभाव पड़ता है_______"
भावनाएं कसमसा उठी,
शरारतें ठीठोलियां हुईं …!
मिट गई कड़वाहटें सभी,
सब रसीली बोलियां हुईं …!!
मुख़ से मुस्कुराहटें झरी…!
और खिल अधर - अधर गए ….!!
रूपसी का रूप देखकर,
आईने संवर-संवर गए…..!!
"मुझे नही लगता अब कहीं होता होगा, शहरों में तो नही होता___ हमारे बुंदेलखंड में हमारे बचपन के समय मे मनिहार निकलते थे सावन में चूड़ियां पहनाने___"
घर - घर मनिहार आ गए,
सावनी त्योहार आ गए ….!
खनन - खनन चूड़ियों की,
लेकर वो झनकार आ गए….!!
सुख़ संभालते - संभालते,
कदम - कदम बिखर - बिखर गए ..!
रूपसी का रूप देखकर,
आईने संवर-संवर गए…..!!
इससे आगे और क्या कहें,
कहते - कहते हम लजा गए….!
बात करते करते प्रेम की,
हम यूहीं करीब आ गए….!!
हवाओं ने क्या मुझको छू लिया,
हम तो बस सिहर - सिहर गए….!
रूपसी का रूप देखकर,
आईने संवर-संवर गए…..!!
मेघ पहली बार जब झरे,
वृक्ष सब निखर - निखर गए .…!
रूपसी पे रूप आ गया,
आईने संवर-संवर गए…..!!
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