Friday, 27 March 2015

उसकी मुस्कान व प्रेम

बहुत अच्छा लगता था

तुम्हारा साथ

ढेरों बातें करना चाहता था

तुम से हर बार


जाने क्यों

मिलने पर भी

सब अनकहा रह जाता था


कितने मीठे थे वो शब्द

जो कहे नहीं गये

शायद

कहने से

मिठास जाती रहती


हमारे बीच

अनकहे को

यूँ ही रहने देना

कितना कर्णप्रिय था


चुप रह कर

हम

एक दूसरे से

बहुत बोलते


न रह सका

एक शब्द भी

प्रेम का बिना सुने


आज सारे

शब्द गूँज

रहे हैं

कानो मे


एक कूक की तरह!!

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